पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
आश्विन शुक्ल पक्ष द्वादशी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, आश्विन. आज है प्रदोष व्रत.
आज द्वादशी तिथि 02:36 PM तक उपरांत त्रयोदशी. नक्षत्र पूर्वभाद्रपदा 09:03 PM तक उपरांत उत्तरभाद्रपदा. ध्रुव योग 10:08 PM तक, उसके बाद व्याघात योग. करण बालव 02:36 PM तक, बाद कौलव 02:12 AM तक, बाद तैतिल. आज राहु काल का समय 10:46 AM – 12:11 PM है. आज 03:03 PM तक चन्द्रमा कुंभ उपरांत मीन राशि पर संचार करेगा.
जीवन की हर लड़ाई जीतनी है, तो कर्म को यज्ञ बनाइए
आजकल प्रबंधन की भाषा में एक बात बहुत कही जाती है—जो भी काम करो, पूरी ताकत से उसमें उतर जाओ। जीतने का जज़्बा रखो, लक्ष्य के प्रति समर्पित रहो और सफलता के लिए अपना सर्वस्व लगा दो। लेकिन भारतीय चिंतन इससे एक कदम आगे की बात कहता है। वह कहता है—केवल युद्ध करना मत सीखिए, अपने कर्म को यज्ञ बनाना सीखिए।
महाभारत के प्रसंग में भीष्म पितामह द्वारा दुर्योधन को दी गई सीख का भाव यही बताया जाता है कि तुम्हारी पराजय का कारण केवल पांडवों की शक्ति नहीं, बल्कि तुम्हारी दृष्टि का अंतर भी है। तुम युद्ध कर रहे हो, जबकि पांडव अपने कर्म को यज्ञ की भावना से कर रहे हैं।
युद्ध में प्रतिद्वंद्वी को हराने की चिंता होती है, जबकि यज्ञ में स्वयं को श्रेष्ठ बनाने का संकल्प होता है। युद्ध का केंद्र अहंकार हो सकता है, लेकिन यज्ञ का केंद्र समर्पण है। युद्ध केवल परिणाम पर टिकता है, जबकि यज्ञ व्यक्ति को प्रक्रिया की पवित्रता भी सिखाता है।
यही कारण है कि हमारे ऋषि-मुनियों ने जीवन के प्रत्येक कर्म को यज्ञ की तरह करने की प्रेरणा दी। लेकिन यह दृष्टि केवल विचारों से नहीं आती। इसके लिए मन, बुद्धि और इंद्रियों पर अधिकार चाहिए। और इसी का मार्ग है—योग।
योग से तय होती है स्वामित्व की असली पहचान
गोरखनाथ और नेपाल के राजा से जुड़ी एक लोककथा इस विचार को बड़े रोचक ढंग से समझाती है।
कथा के अनुसार, गुरु गोरखनाथ ने नेपाल के राजा से दूध माँगा। राजा दूध लेकर उपस्थित हुए। गोरखनाथ ने दूध पिया और उनके हाथ पर थूक दिया। राजा ने हाथ पीछे खींच लिया, जिससे वह थूक उनके पैर पर गिरा। तब गोरखनाथ ने कहा कि यदि तुमने हाथ स्थिर रखा होता, तो योगियों की तरह अपनी इंद्रियों के स्वामी बनते; लेकिन तुमने हाथ पीछे खींच लिया, इसलिए भू-स्वामी ही बने रहे।
इस कथा का मर्म किसी राजा के पद या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि आत्मसंयम की महत्ता में है। भूमि पर अधिकार होना और स्वयं पर अधिकार होना—दो अलग बातें हैं। संसार को जीत लेना बड़ी उपलब्धि हो सकती है, लेकिन अपने मन और इंद्रियों को साध लेना उससे भी बड़ी उपलब्धि है।
हर सफल व्यक्ति के भीतर एक राजा है
आज का मनुष्य भी किसी न किसी विजय-यात्रा पर निकला है। कोई व्यवसाय में सफलता चाहता है, कोई नौकरी में आगे बढ़ना चाहता है, कोई राजनीति में स्थान बनाना चाहता है और कोई समाज में अपनी पहचान स्थापित करना चाहता है। लक्ष्य अलग-अलग हैं, लेकिन आकांक्षा एक ही है—जीवन में कुछ हासिल करना।
इस अर्थ में हर वह व्यक्ति राजा है, जो सफलता की खोज में निकला है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या वह अपनी इच्छाओं का स्वामी है? क्या वह दबाव में भी विवेक बनाए रख सकता है? क्या सफलता की दौड़ में वह अपने भीतर का संतुलन बचाए रख सकता है?
यहीं योग की आवश्यकता सामने आती है।
योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने का अभ्यास नहीं है। वह अपने भीतर व्यवस्था स्थापित करने की साधना है। जब मन स्थिर होता है, बुद्धि स्पष्ट होती है और इंद्रियाँ संयमित होती हैं, तब व्यक्ति परिस्थितियों का दास बनने के बजाय उनका विवेकपूर्ण सामना करने लगता है।
इसलिए सफलता की यात्रा पर निकलने से पहले अपने भीतर की यात्रा के लिए भी समय निकालिए।
प्रतिदिन कुछ समय योग, ध्यान और आत्मचिंतन को दीजिए। अपने कर्म को केवल उपलब्धि पाने का साधन नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व और साधना मानिए। यही कर्म को यज्ञ की भावना से करने का रास्ता है।
फिर आप व्यवसाय में हों, राजनीति में हों, नौकरी कर रहे हों या समाज के लिए कुछ बड़ा करने निकले हों—आपके भीतर का संतुलन आपको बेहतर निर्णय लेने, कठिनाइयों का धैर्य से सामना करने और सफलता के साथ विनम्र बने रहने की शक्ति देगा।
याद रखिए—जीतने के लिए शक्ति चाहिए, लेकिन सही ढंग से जीतने के लिए योग चाहिए। और जब कर्म में योग तथा जीवन में यज्ञ की भावना जुड़ जाती है, तब सफलता केवल एक उपलब्धि नहीं रहती, वह व्यक्तित्व की सिद्धि बन जाती है।