आज का पंचांग : दूसरों की पसंद बनना है, तो चापलूसी नहीं, उन्हें सुनना सीखिए

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.

आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, आश्विन.

आज दशमी तिथि 02:12 PM तक उपरांत एकादशी | नक्षत्र धनिष्ठा 07:47 PM तक उपरांत शतभिषा | गण्ड योग 12:32 AM तक, उसके बाद वृद्धि योग | करण गर 02:12 PM तक, बाद वणिज 02:36 AM तक, बाद विष्टि | आज राहु काल का समय 12:11 PM – 01:36 PM है | आज 07:00 AM तक चन्द्रमा मकर उपरांत कुंभ राशि पर संचार करेगा.

दूसरों की पसंद बनना है, तो चापलूसी नहीं, उन्हें सुनना सीखिए

मनुष्य ने अनेक पशुओं को अपनी आवश्यकताओं और उपयोगिता के लिए अपने जीवन से जोड़ा। किसी से दूध मिला, किसी से श्रम लिया, तो किसी से परिवहन और सुरक्षा में सहायता मिली। लेकिन श्वान का मनुष्य के साथ संबंध एक अलग ही मनोविज्ञान सामने रखता है। वह केवल उपयोगिता का साथी नहीं, बल्कि मनुष्य के भावनात्मक संसार का भी हिस्सा बन गया है।

इस संबंध में एक दिलचस्प मानवीय प्रवृत्ति छिपी है। मनुष्य को अच्छा लगता है कि कोई उसे महत्व दे, उसकी बात माने, उसके आसपास रहे और आवश्यकता पड़ने पर उसकी रक्षा भी करे। कोई उसके आने पर प्रसन्न हो, उसकी उपस्थिति को स्वीकार करे और उसके साथ जुड़ाव महसूस करे। श्वान का व्यवहार अक्सर मनुष्य की इसी भावनात्मक आवश्यकता को संतुष्ट करता है।

आखिर किसे अच्छा नहीं लगता कि कोई उसे महत्व दे, उसकी बात ध्यान से सुने और उसके सामने प्रसन्नता व्यक्त करे?

यहीं से एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—यदि हम भी दूसरों के प्रिय बनना चाहते हैं, तो हमें क्या करना चाहिए?

क्या इसके लिए चापलूसी करनी होगी? क्या हर बात में सहमति जतानी होगी? क्या अपनी गरिमा छोड़कर दूसरों को प्रसन्न रखना होगा?

नहीं। दूसरों का प्रिय बनने का अर्थ अपनी आत्मसम्मान की कीमत चुकाना नहीं है। वास्तविक आकर्षण चापलूसी में नहीं, बल्कि उस व्यवहार में है, जिससे सामने वाले को महसूस हो कि वह सुना जा रहा है, समझा जा रहा है और उसका महत्व है।

जब कोई व्यक्ति आपसे बात करे, तो उसे पूरा अवसर दीजिए। बीच में टोकने, तुरंत सलाह देने या अपनी बात थोपने की जल्दबाजी मत कीजिए। कई बार सामने वाले को समाधान से पहले एक ऐसे श्रोता की आवश्यकता होती है, जो बिना अधीर हुए उसकी बात सुन सके।

सुनना भी एक कला है और किसी को ध्यान से सुनना उसके प्रति सम्मान व्यक्त करने का सबसे सरल तरीका।

जब प्रतिक्रिया देने की बारी आए, तो शब्दों का चयन सोच-समझकर कीजिए। हर सच तत्काल और कठोरता से बोलना आवश्यक नहीं होता। सही बात को सही समय पर, उचित भाषा में कहना ही संवाद की परिपक्वता है।

आपकी आंखों में सहज मुस्कान हो, व्यवहार में विनम्रता हो और समय देने में ईमानदारी हो। सामने वाले को यह अनुभव होना चाहिए कि आप केवल औपचारिकता निभाने के लिए नहीं, बल्कि उसकी बात समझने के लिए उपस्थित हैं।

लेकिन यह भी याद रखिए कि किसी को महत्व देने और स्वयं को महत्वहीन बना देने में अंतर है। हर बात पर सहमति जताना, अनुचित व्यवहार सहना या प्रशंसा पाने के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता करना संबंधों को मजबूत नहीं बनाता।

जीवन में कई बार आपकी योग्यता से पहले आपका व्यवहार लोगों के मन में जगह बनाता है। आपकी बातों से अधिक आपका सुनना, आपके ज्ञान से अधिक आपकी विनम्रता और आपके पद से अधिक आपका मानवीय व्यवहार लोगों को प्रभावित करता है।

इसलिए यदि आप चाहते हैं कि लोग आपको पसंद करें, आपके साथ समय बिताना चाहें और आप पर विश्वास करें, तो चापलूसी छोड़िए, संवेदनशीलता अपनाइए। दूसरों की बात सुनिए, उनके समय का सम्मान कीजिए और अपनी उपस्थिति को उनके लिए सहज बनाइए।

क्योंकि किसी के सामने दुम हिलाकर नहीं, बल्कि उसके मन में सम्मान जगाकर ही स्थायी स्थान बनाया जाता है।