पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
कार्तिक कृष्ण पक्ष नवमी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, आश्विन.
आज नवमी तिथि 11:54 AM तक उपरांत दशमी. नक्षत्र मघा 03:26 AM तक उपरांत पूर्व फाल्गुनी. शुक्ल योग 09:53 AM तक, उसके बाद ब्रह्म योग. करण गर 11:55 AM तक, बाद वणिज 11:26 PM तक, बाद विष्टि. आज राहु काल का समय 02:57 PM – 04:20 PM है. आज चन्द्रमा सिंह राशि पर संचार करेगा.
शरीर से आत्मा तक की यात्रा
मनुष्य होने के लिए केवल कर्म करना पर्याप्त नहीं है, सृजन करना पड़ता है। और सृजन की वास्तविक यात्रा तब आरंभ होती है, जब मनुष्य शरीर से आगे बढ़कर आत्मा तक पहुँचने का प्रयास करता है। यदि यह यात्रा अधूरी रह गई, तो मनुष्य देह धारण करके भी मनुष्यता के गहरे अर्थ से अपरिचित रह सकता है।
श्रीराम ने काकभुशुंडि को ऐसे छह सूत्र दिए थे, जो मनुष्य की चेतना को आत्मा की ओर ले जाने वाले बूस्टर बन जाते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास जी श्रीरामचरितमानस में लिखते हैं—
“भगति ग्यान विज्ञान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा॥ जानब ते सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा॥”
अर्थात् भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग तथा मेरी लीलाओं के रहस्य और उनके विभिन्न स्वरूपों के भेद को तू मेरी कृपा से जान जाएगा। तुझे इनकी प्राप्ति के लिए साधना का कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा।
यहाँ श्रीराम छह ऐसे सूत्रों की ओर संकेत करते हैं, जो मनुष्य के भीतर शुभता का विस्तार करते हैं—भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग और प्रभु की लीलाओं के रहस्य का बोध।
ये केवल आध्यात्मिक शब्द नहीं हैं, बल्कि जीवन को देखने की छह दृष्टियाँ हैं। भक्ति हृदय को निर्मल करती है, ज्ञान विवेक जगाता है, विज्ञान सत्य की अनुभूति कराता है, वैराग्य आसक्ति से मुक्त करता है, योग भीतर की चेतना को जोड़ता है और प्रभु की लीलाओं का बोध जीवन के रहस्यों को समझने की दृष्टि देता है।
और इन सबके बीच श्रीराम का एक अत्यंत गहरा आश्वासन है—“मम प्रसाद नहिं साधन खेदा।”
अर्थात् जब ईश्वर की कृपा होती है, तो साधना का मार्ग भी सहज होने लगता है। जिस सत्य को पाने के लिए मनुष्य जीवनभर संघर्ष करता है, वह कृपा के क्षण में उसके भीतर ही प्रकट होने लगता है।
हम संसार में रहते हुए अपने चारों ओर कितनी ही वस्तुएँ, संबंध, इच्छाएँ और उपलब्धियाँ एकत्रित कर लेते हैं। लेकिन इन सबके साथ एक अदृश्य बोझ भी जुड़ता चला जाता है। जिसे हम सुख का साधन समझते हैं, वही कभी-कभी दुःख का कारण बन जाता है।
परंतु यदि जीवन में ये छह शुभ गुण विकसित हो जाएँ, तो संसार हमारे लिए बंधन नहीं, अनुभव का माध्यम बन सकता है।
हम संसार में रहेंगे, संबंध निभाएँगे, कर्म करेंगे, उपलब्धियों का आनंद लेंगे; लेकिन संसार के दुःख हमारी आत्मा को विचलित नहीं कर पाएँगे।
संसार से भागना वैराग्य नहीं है। संसार में रहते हुए संसार को अपने भीतर न बसने देना ही वास्तविक वैराग्य है।
शायद मनुष्य होने की यात्रा का सार भी यही है—देह से आरंभ होकर आत्मा तक पहुँचना और फिर आत्मा के प्रकाश में संसार को नए अर्थों में देखना।