भारतीय सनातन परंपरा में पंचांग का महत्व अति प्राचीन काल से ही रहा है। यह केवल तिथि और वार जानने का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय कालगणना, ज्योतिष और धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में पंचांग को विशेष स्थान प्राप्त है, क्योंकि इसके माध्यम से तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण जैसे पंच अंगों का ज्ञान होता है.
इसी प्राचीन ज्ञान-परंपरा को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से ‘हिमशिखर खबर’ प्रतिदिन आपके लिए पंचांग प्रस्तुत करता है—ताकि आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच हमारी कालगणना, संस्कृति और सनातन परंपराओं से हमारा जुड़ाव बना रहे.
पंडित उदय शंकर भट्ट
भाद्रपद कृष्ण पक्ष नवमी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, श्रावण. आज है नवमी.
आज नवमी तिथि 09:53 PM तक उपरांत दशमी. नक्षत्र म्रृगशीर्षा 09:30 PM तक उपरांत आद्रा. वज्र योग 12:46 PM तक, उसके बाद सिद्धि योग. करण तैतिल 11:04 AM तक, बाद गर 09:54 PM तक, बाद वणिज. आज राहु काल का समय 09:19 AM – 10:52 AM है. आज 10:18 AM तक चन्द्रमा वृषभ उपरांत मिथुन राशि पर संचार करेगा.
अन्न से आत्मा तक : भीतर की यात्रा का पहला पड़ाव
इस संसार में कुछ जोड़ियाँ ऐसी हैं, जो अपने आप में पूर्ण दिखाई देती हैं। लेकिन जीवन की गहराई में उतरें तो पता चलता है कि केवल साथ होना पर्याप्त नहीं, सही तालमेल में होना आवश्यक है।
ज्ञान हो, तो उसके साथ विवेक होना चाहिए।
शील हो, तो उसके साथ सदाचार होना चाहिए।
सत्य हो, तो उसके साथ अहिंसा जुड़ी होनी चाहिए।
सुख मिले, तो उसके साथ शांति भी हो।
प्रेम हो, तो उससे आनंद प्रस्फुटित हो।
और चरित्र हो, तो उसके साथ नैतिकता का प्रकाश भी होना चाहिए।
इनमें से किसी एक का अभाव दूसरे को अधूरा कर देता है। ज्ञान यदि विवेक से रहित है तो वह अहंकार बन सकता है। सत्य यदि करुणा से रिक्त है तो कठोरता बन सकता है। सुख यदि शांति से विहीन है तो केवल भोग बनकर रह जाता है। प्रेम यदि आनंद तक न पहुँचे तो वह आसक्ति में बदल सकता है।
अर्थात जीवन का सौंदर्य केवल गुणों को अर्जित करने में नहीं, उनके बीच संतुलन स्थापित करने में है। और यह संतुलन बाहर से नहीं आता। इसे भीतर उतरकर, आत्मा के स्तर पर समझना पड़ता है।
मनुष्य की सबसे बड़ी यात्रा बाहर की दुनिया की यात्रा नहीं, बल्कि स्वयं से स्वयं तक की यात्रा है।
हम अपने शरीर को सुख-सुविधाओं का अभ्यस्त बनाते जाते हैं, जबकि साधना का मार्ग कहता है कि शरीर पर अनुशासन हो और मन पर संयम। शरीर को इतना अनुशासित करना होगा कि वह इंद्रियों का स्वामी बने, दास नहीं। मन को इतना साधना होगा कि वह हमें भटकाए नहीं, बल्कि भीतर की ओर ले जाए।
कई लोग कहते हैं—ध्यान करना कठिन है, मन एकाग्र नहीं होता, विचार रुकते नहीं। यह स्वाभाविक भी है। मन को सीधे रोकना आसान नहीं। लेकिन भीतर जाने का मार्ग केवल ध्यान से ही शुरू नहीं होता। कभी-कभी ध्यान की पहली सीढ़ी रसोई से होकर भी जाती है।
हम क्या खाते हैं, कितना खाते हैं और किस भाव से खाते हैं—इन तीनों का प्रभाव केवल शरीर पर नहीं, मन पर भी पड़ता है।
भारतीय परंपरा ने इसलिए सदियों पहले ही कहा—“जैसा अन्न, वैसा मन।” आज आधुनिक विज्ञान भी आहार, पाचन-तंत्र और मस्तिष्क के बीच गहरे संबंध को समझने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आंतों और मस्तिष्क के बीच निरंतर संवाद होता है, जिसे आधुनिक विज्ञान gut-brain axis कहता है। इसलिए भोजन को केवल पेट भरने का साधन मानना जीवन की एक बड़ी भूल है।
अन्न केवल शरीर नहीं बनाता, वह हमारी वृत्तियों को भी प्रभावित करता है।
शुद्ध अन्न का अर्थ केवल साफ-सुथरा भोजन नहीं है। उसमें भोजन की गुणवत्ता के साथ उसकी प्राप्ति, तैयारी और ग्रहण करने का भाव भी जुड़ा है। जिस अन्न में श्रम की पवित्रता हो, प्रकृति के प्रति सम्मान हो और उसे ग्रहण करते समय कृतज्ञता हो, वह भोजन एक साधारण क्रिया से उठकर साधना का रूप ले सकता है।
इसलिए यदि ध्यान कठिन लगता है तो शुरुआत बहुत सरल जगह से की जा सकती है—अपनी थाली से।
थाली को देखिए।
अपने भोजन को पहचानिए।
भूख और स्वाद के अंतर को समझिए।
आवश्यकता और लालच के बीच की दूरी को महसूस कीजिए।
यहीं से संयम जन्म लेता है। और जहां संयम जन्म लेता है, वहीं से मन धीरे-धीरे शांत होने लगता है।
शायद इसी अर्थ में कहा जा सकता है कि यदि अन्न साध लिया, तो ध्यान की आधी यात्रा अपने आप शुरू हो गई।
क्योंकि आत्मा तक पहुँचने का मार्ग हमेशा किसी कठिन आसन या गहन साधना से ही शुरू हो, ऐसा आवश्यक नहीं। कभी वह एक निवाले से शुरू होता है—इस सजगता के साथ कि मैं क्या अपने भीतर उतार रहा हूँ?
अंततः मनुष्य वही नहीं है जो वह सोचता है; बहुत कुछ वह भी है जो वह अपने भीतर ग्रहण करता है।
इसलिए आत्मयात्रा का पहला प्रश्न शायद यह नहीं होना चाहिए कि “मैं ध्यान कैसे करूँ?”
बल्कि यह होना चाहिए—
“मैं अपने भीतर क्या भर रहा हूँ?”
यही प्रश्न धीरे-धीरे अन्न से मन तक, मन से विवेक तक और विवेक से आत्मा तक ले जाता है।
और शायद यही भीतर की यात्रा का सबसे सरल, सबसे मौन और सबसे सच्चा आरंभ है।