सुप्रभातम् : विपरीत हालात में धैर्य नहीं खोना चाहिए

हिमशिखर धर्म डेस्क

श्रीराम सीता विवाह के बाद राजा दशरथ ने राम के राज्याभिषेक की घोषणा की। जब घोषणा दशरथ ने की थी तो इसके बदलने की संभावनाएं भी नहीं थीं। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था।

राज्याभिषेक से पहले वाली रात कैकयी ने मंथरा की संगत की। तो कैकयी ने मंथरा के भड़काने पर राजा दशरथ से भरत का राज्याभिषेक तथा श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास मांग लिया। कैकयी ने दशरथ से ये दो वर मांग लिए और अपनी इच्छाएं पूरी करवा लीं।

दशरथ ने जब राम को बुलवाया और ये बातें बताईं तो वे धैर्य के साथ सारी बातें सुनते रहे। पिता के वचन को पूरा करने के लिए राम वनवास जाने के लिए वहां से चल दिए।

उस समय दशरथ ने कैकयी से कहा, ‘तुम राम को वनवास जाने से रोक लो। इसने जीवन में कभी भी धैर्य नहीं खोया है। ये हर काम शांति से ही करता है। अगर तुम ये सोच रही हो कि वनवास भेजकर राम को कोई सजा दे रही हो तो ये सोच गलत है। राम किसी से कोई शिकायत नहीं करेगा और चुपचाप वन में चला जाएगा। राम जैसे लोग कभी विचलित नहीं होते हैं। ये बात मैं इसलिए नहीं कह रहा हूं कि मैं इसका पिता हूं। बल्कि, मैं राम को बहुत अच्छी तरह जानता हूं, इसलिए ये बातें कह रहा हूं।’ हुआ भी ऐसा ही, राम पूरी सहजता के साथ वनवास चले गए।

सीख – यहां श्रीराम ने ये सीख दी है कि ऐसा जरूरी नहीं कि जो हम सोचते हैं, वैसा ही हो। कभी-कभी जैसी हमारी सोच होती है, वैसा नहीं होता, बल्कि उल्टा ही हो जाता है। ऐसे हालात में भी धैर्य और शांति बनाए रखनी चाहिए। यही धैर्यवान इंसान की निशानी है।