पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, भाद्रपद. आज है पूर्णिमा व्रत, पूर्णिमा, भाद्रपद पूर्णिमा, सत्य व्रत और सत्य व्रत.
आज पूर्णिमा तिथि 10:18 PM तक उपरांत प्रतिपदा. नक्षत्र पूर्वभाद्रपदा 11:32 AM तक उपरांत उत्तरभाद्रपदा. गण्ड योग 01:17 PM तक, उसके बाद वृद्धि योग. करण विष्टि 10:47 AM तक, बाद बव 10:19 PM तक, बाद बालव. आज राहु काल का समय 09:19 AM – 10:48 AM है. आज चन्द्रमा मीन राशि पर संचार करेगा.
शास्त्र को मत बदलो, स्वयं को पढ़ो
कभी-कभी रात के बहुत गहरे सन्नाटे में एक प्रश्न भीतर से उठता है—
क्या शास्त्र बदलते हैं, या हम बदलते-बदलते शास्त्रों को भी अपने जैसा बना देते हैं?
यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही गहरा है।
शास्त्रों को शुद्ध रखना शायद इसलिए कठिन है कि शास्त्र केवल कागज पर लिखे हुए शब्द नहीं होते। वे समय के पार से आती हुई कोई ऐसी ध्वनि होते हैं, जिसे हर युग अपने कानों से सुनता है, लेकिन अपने मन के अनुसार उसका अर्थ निकालने लगता है।
शब्द वही रहते हैं।
समय बदल जाता है।
मनुष्य बदल जाता है।
और फिर धीरे-धीरे शब्दों के आसपास मनुष्य की अपनी इच्छाएं, धारणाएं और बुद्धि की परतें जमने लगती हैं।
एक दिन हम मूल शास्त्र को देखते हैं और सोचते हैं—
यह तो वही है।
लेकिन क्या सचमुच वही है?
या उसके चारों ओर हमने अपनी-अपनी व्याख्याओं का इतना संसार खड़ा कर दिया है कि मूल स्वर कहीं भीतर दब गया है?
यही शास्त्र का रहस्य है।
शब्द के पीछे जो मौन है
गीता को देखिए।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से संवाद किया। युद्धभूमि में खड़ा एक मनुष्य अपने भीतर के युद्ध से कांप रहा था और सामने खड़ा था उसका सारथी।
वह संवाद केवल अर्जुन और कृष्ण के बीच था या मनुष्य और उसकी अंतरात्मा के बीच?
यह प्रश्न आज भी खुला हुआ है।
गीता पर असंख्य व्याख्याएं हुईं। विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से उसके अर्थ खोले। किसी ने कर्म देखा, किसी ने ज्ञान, किसी ने भक्ति, किसी ने योग।
यह सब अपनी जगह है।
लेकिन कभी-कभी मैं स्वयं से पूछता हूं—
जिस क्षण गीता वास्तव में समझ में आती होगी, उस क्षण क्या मनुष्य को उसमें कुछ जोड़ने की इच्छा होती होगी?
शायद नहीं।
क्योंकि जिसे सत्य की एक झलक मिल जाती है, वह सत्य को सजाने नहीं बैठता।
वह मौन हो जाता है।
उसे लगता है—
जो मिलना था, मिल गया।
जो सुनना था, सुन लिया।
जो समझना था, समझ लिया।
अब मैं इसमें अपना क्या जोड़ूं?
शायद सच्ची समझ की पहली निशानी यही है कि मनुष्य अपनी विद्वत्ता को थोड़ा पीछे कर देता है।
शास्त्र और वॉलीबॉल
आज मुझे एक अजीब-सा उदाहरण याद आता है—वॉलीबॉल।
‘वॉली’ अर्थात किसी वस्तु को प्रहार करके उछालना।
क्या हम शास्त्रों के साथ भी कुछ ऐसा ही नहीं कर रहे?
एक व्यक्ति एक अर्थ निकालता है।
दूसरा उसी अर्थ को अपने ढंग से उछाल देता है।
तीसरा उसमें अपनी विद्वत्ता जोड़ देता है।
चौथा उसे और आगे पहुंचा देता है।
शब्द हवा में लगातार घूमते रहते हैं।
लेकिन प्रश्न यह है—
क्या कोई उन्हें पकड़कर अपने भीतर भी उतारता है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि शास्त्र के शब्दों की वॉली तो चल रही है, लेकिन शास्त्र का अनुभव कहीं जमीन पर पड़ा हुआ है?
हम बोल रहे हैं।
व्याख्या कर रहे हैं।
तर्क कर रहे हैं।
उद्धरण दे रहे हैं।
लेकिन क्या हम जी रहे हैं?
यही प्रश्न शायद सबसे असुविधाजनक है।
क्योंकि शास्त्र पढ़ना सरल है।
शास्त्र पर बोलना भी सरल है।
शास्त्र की व्याख्या करना भी कभी-कभी सरल हो जाता है।
कठिन है—शास्त्र को अपने जीवन में उतार देना।
जब शब्द रास्ता रोकने लगें
शास्त्र का उद्देश्य मनुष्य को मुक्त करना है।
लेकिन यदि हमारी व्याख्याएं ही उसके और मनुष्य के बीच दीवार बन जाएं, तो कहीं न कहीं हमें रुककर सोचना होगा।
नई पीढ़ी जब पूछती है—
“इतना कठिन क्यों है?”
तो क्या हम केवल यह कहकर आगे बढ़ जाएं कि उन्हें समझ नहीं है?
या कभी अपने भीतर भी देखें—
क्या हमने उसे सरलता से समझाने की कोशिश की?
शास्त्र कठिन नहीं भी हो सकता है।
कठिन तो हमारा प्रस्तुत करने का ढंग हो सकता है।
हमने शायद शब्दों के इतने महल खड़े कर दिए कि बच्चा मूल आंगन तक पहुंच ही नहीं पाया।
उसे बताया गया कि शास्त्र बहुत महान है।
लेकिन शायद उसे यह नहीं बताया गया कि—
शास्त्र तुम्हारे जीवन के किस क्षण में तुम्हारे साथ खड़ा होगा।
जब तुम अकेले होगे।
जब निर्णय कठिन होगा।
जब मोह तुम्हें खींचेगा।
जब क्रोध तुम्हारे भीतर उठेगा।
जब असफलता तुम्हें तोड़ेगी।
जब सफलता तुम्हारे भीतर अहंकार पैदा करेगी।
तब शास्त्र क्या करेगा?
यदि हम यह बता सकें, तो शायद शास्त्र फिर से उसके अपने हो जाएंगे।
शास्त्र में जोड़ने से पहले स्वयं को देखिए
शास्त्रों में घटाना-बढ़ाना आसान है।
अपने भीतर से कुछ घटाना कठिन है।
शास्त्र के शब्द बदलना आसान है।
अपनी आदत बदलना कठिन है।
शास्त्र की व्याख्या करना आसान है।
अपने अहंकार की व्याख्या करना कठिन है।
इसीलिए शायद हमारी साधना का रास्ता उलटा होना चाहिए।
पहले शास्त्र को अपने अनुसार बदलने की कोशिश न करें।
पहले स्वयं से पूछें—
क्या मैं शास्त्र के अनुसार बदल सकता हूं?
यदि गीता कहती है कर्म करो, तो मैं अपने कर्म को देखूं।
यदि वह समत्व की बात करती है, तो अपने भीतर के उतार-चढ़ाव को देखूं।
यदि वह मोह से बाहर आने को कहती है, तो अपने मोह को पहचानूं।
यदि वह आत्मा की बात करती है, तो एक क्षण के लिए अपने शरीर, पद, नाम, धन और पहचान के पार जाकर स्वयं से पूछूं—
मैं वास्तव में कौन हूं?
शायद यहीं से शास्त्र पुस्तक से उठकर अनुभव बनना शुरू करता है।
अगली पीढ़ी को क्या दें?
हम अपने बच्चों को क्या सौंप रहे हैं?
केवल श्लोक?
केवल व्याख्याएं?
केवल परंपराएं?
या वह जीवन-दृष्टि, जिसने इन श्लोकों को जन्म दिया?
हमें अपने शास्त्रों में मनमाना घटाव-बढ़ाव करने की आवश्यकता नहीं है।
हमें उनमें से जीवन की रोशनी खोजने की आवश्यकता है।
जो बात बच्चे को सत्य के करीब ले जाए, उसे दें।
जो उसे करुणा सिखाए, उसे दें।
जो उसे जिम्मेदारी सिखाए, उसे दें।
जो उसे अपने भीतर झांकना सिखाए, उसे दें।
जो उसे यह समझाए कि धर्म केवल पूजा का नाम नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने की साधना है—उसे दें।
शायद यही शास्त्रों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का सबसे स्वाभाविक मार्ग है।
और अंत में एक प्रश्न…
कभी अकेले बैठकर अपने सामने गीता रखिए।
उसे पढ़ने से पहले कुछ क्षण मौन रहिए।
फिर स्वयं से पूछिए—
मैं गीता को पढ़ रहा हूं,
या गीता मुझे पढ़ रही है?
मैं शास्त्र को समझने आया हूं,
या शास्त्र मेरे भीतर कुछ ऐसा दिखाने आया है,
जिससे मैं अब तक आंखें चुराता रहा हूं?
शायद शास्त्र का असली रहस्य वहीं से खुलता है।
जब पुस्तक बंद होती है
और संवाद भीतर शुरू होता है।
जब शब्द शांत होते हैं
और मौन बोलने लगता है।
जब हम व्याख्याकार नहीं रहते
और एक साधारण जिज्ञासु बन जाते हैं।
तब शायद पता चलता है—
शास्त्र को बचाने के लिए उसे बदलना नहीं पड़ता।
उसे ईमानदारी से पढ़ना पड़ता है।
और शायद उससे भी अधिक—
शास्त्र को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए हमें उसमें कुछ नया जोड़ने की जरूरत नहीं है;
हमें उसके प्रकाश को अपने जीवन में जलाए रखना है।
क्योंकि प्रकाश में अपनी रोशनी मिलाने की आवश्यकता नहीं होती।
वह स्वयं प्रकाश है।
और शायद प्रश्न शास्त्र का नहीं है।
प्रश्न हमारा है—
क्या हम उस प्रकाश में स्वयं को देखने का साहस रखते हैं?