आज का पंचांग : सहनशीलता और समर्पण

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है।

भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी, सिद्धार्थि संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, भाद्रपद |आज है ऋषि पंचमी|

आज चतुर्थी तिथि 07:44 AM तक उपरांत पंचमी | नक्षत्र स्वाति 03:21 PM तक उपरांत विशाखा | इन्द्र योग 12:19 PM तक, उसके बाद वैधृति योग | करण विष्टि 07:44 AM तक, बाद बव 08:17 PM तक, बाद बालव | आज राहु काल का समय 03:24 PM – 04:55 PM है | आज चन्द्रमा तुला राशि पर संचार करेगा.

सहनशीलता और समर्पण

जीवन में हर बात अपने मन के अनुसार हो, हर व्यक्ति हमें सम्मान दे और हर परिस्थिति हमारी इच्छाओं के अनुरूप रहे—ऐसा संभव नहीं। जीवन की वास्तविक परीक्षा वहीं से शुरू होती है, जहाँ परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल नहीं होतीं।

किसी ने कटु वचन कहे और हमने उन्हें सह लिया, किसी ने अपेक्षित सम्मान नहीं दिया और हमने उसे भी सह लिया। कभी हमारी इच्छा के विपरीत कोई निर्णय हुआ, फिर भी हमने धैर्य नहीं खोया। कभी हमारी आलोचना हुई और हमने प्रतिउत्तर देने के बजाय मौन को चुना—यही सहनशीलता है।

सहनशीलता कमजोरी नहीं, बल्कि भीतर की शक्ति का प्रमाण है। हर बात का उत्तर देना आवश्यक नहीं होता और हर आलोचना का प्रतिकार करना भी बुद्धिमानी नहीं। कई बार मौन ही वह उत्तर होता है, जो शब्दों से कहीं अधिक प्रभावशाली होता है।

इसी सहनशीलता के साथ जब व्यक्ति अपने अहंकार, स्वार्थ और व्यक्तिगत आग्रहों को पीछे छोड़कर किसी बड़े उद्देश्य के लिए स्वयं को समर्पित करता है, तो वह समर्पण कहलाता है।

एक स्वर्णखंड को ही देखिए। जौहरी जब उसे मूल्यवान आभूषण का रूप देना चाहता है तो उसे अग्नि में तपाता है, हथौड़े से पीटता है, काटता है और बार-बार आकार देता है। स्वर्ण उन आघातों का विरोध नहीं करता। वह हर चोट को सहते हुए अपने भीतर छिपी सुंदरता को प्रकट करता जाता है। अंततः वही साधारण-सा स्वर्ण एक अनुपम आभूषण बनकर प्रतिष्ठित होता है।

मनुष्य का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। परिस्थितियाँ उसकी अग्नि हैं, संघर्ष उसके आघात हैं और धैर्य उसकी कसौटी। जो व्यक्ति इन सबको सहते हुए अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित रहता है, समय उसे साधारण से असाधारण बना देता है।

सहनशीलता हमें भीतर से मजबूत करती है और समर्पण हमें भीतर से निर्मल। दोनों मिलकर व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करते हैं। यही चरित्र आगे चलकर समाज में उसकी उपयोगिता, विश्वसनीयता और मूल्य को बढ़ाता है।

इसलिए जीवन में हर चोट को अपमान न समझें, हर आलोचना को शत्रुता न मानें और हर प्रतिकूल परिस्थिति को दुर्भाग्य न समझें। हो सकता है, जीवन आपको तोड़ नहीं रहा हो—आपको तराश रहा हो।

क्योंकि—

“जो सहना सीख जाता है, वह बिखरता नहीं;
और जो समर्पण सीख जाता है, वह झुककर भी ऊँचा उठता है।”