पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
भाद्रपद शुक्ल पक्ष द्वादशी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, भाद्रपद.
आज द्वादशी तिथि 10:50 PM तक उपरांत त्रयोदशी. नक्षत्र श्रवण 09:09 AM तक उपरांत धनिष्ठा. सुकर्मा योग 04:26 PM तक, उसके बाद धृति योग. करण बव 10:22 AM तक, बाद बालव 10:51 PM तक, बाद कौलव. आज राहु काल का समय 12:19 PM – 01:49 PM है. आज 09:56 PM तक चन्द्रमा मकर उपरांत कुंभ राशि पर संचार करेगा.
डरकर नहीं, समझकर पूजा करें
पूजा कसरत नहीं, परमात्मा से सीधी बातचीत है
क्या हमने अपने बच्चों को पूजा सिखाई है—या केवल पूजा करने का डर?
शायद अब समय आ गया है कि हम इस प्रश्न से ईमानदारी से रूबरू हों।
हमने पूजा को कई बार भय से जोड़ दिया। बचपन में कहा गया—यह मत करो, भगवान नाराज़ हो जाएंगे; वहाँ मत जाओ, पाप लगेगा; पूजा नहीं की तो अनिष्ट हो जाएगा। धीरे-धीरे पूजा प्रेम और संवाद का माध्यम कम, भय से बचने का उपाय अधिक बनती चली गई।
एक व्यक्ति बड़े गर्व से कहता था—
“मैं रात को पूजा करके ही सोता हूं।”
किसी ने एक दिन सहजता से पूछ लिया—
“आप रात को पूजा क्यों करते हैं?”
उसने उत्तर दिया—
“क्योंकि मैं रात के अंधेरे में डरता हूं। डर को दूर करने के लिए पूजा करता हूं।”
यही तो हमारी समस्या है।
पूजा डर से शुरू नहीं होनी चाहिए। पूजा वह अनुभव है, जिसके बाद डर टिकता नहीं।
अखाड़े में उस्ताद खड़ा हो तो पहलवान कसरत करता है। हमने शायद पूजा को भी ऐसी ही एक गतिविधि बना दिया—एक काम, जिसे करना है; एक नियम, जिसे निभाना है; एक कर्मकांड, जिसे पूरा करना है।
लेकिन पूजा कोई कसरत नहीं है।
पूजा परमात्मा के साथ संवाद है।
यह वह क्षण है जब मनुष्य अपने भीतर उतरकर उस विराट सत्ता से बात करता है, जिसे वह ईश्वर, परमात्मा, सत्य, चेतना या अपने आराध्य के नाम से पुकारता है।
और इस वार्ता के लिए किसी मध्यस्थ की अनिवार्यता क्यों हो?
जहाँ हृदय और परमात्मा के बीच सीधा संबंध हो, वहाँ भय का स्थान कहाँ है?
बच्चों को हमें यह नहीं सिखाना कि “पूजा नहीं करोगे तो भगवान नाराज़ होंगे।”
उन्हें यह सिखाना होगा—
“पूजा इसलिए करो क्योंकि तुम्हें अपने भीतर शांति चाहिए।
पूजा इसलिए करो क्योंकि तुम्हें अपने मन से बात करनी है।
पूजा इसलिए करो क्योंकि तुम्हें अपने से बड़े सत्य से जुड़ना है।”
दुनिया में आज हर उम्र का मनुष्य किसी न किसी भय से घिरा हुआ है। बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं। उनके पास साधन बढ़े हैं, लेकिन भीतर का खालीपन भी बढ़ा है।
स्कूल से लौटते ही मोबाइल चाहिए।
खाना खाते समय मोबाइल चाहिए।
अकेले होते ही मोबाइल चाहिए।
प्रश्न केवल मोबाइल का नहीं है।
प्रश्न उस खालीपन का है, जिसे बच्चा मोबाइल से भरने की कोशिश कर रहा है।
अगर हम समय रहते उसके भीतर संवाद, मौन, प्रार्थना, कृतज्ञता और आत्मचिंतन की जगह बना दें, तो शायद उसे हर खाली क्षण में किसी स्क्रीन की जरूरत न पड़े।
पूजा को बच्चों पर थोपने की आवश्यकता नहीं है।
उन्हें पूजा का अर्थ समझाने की आवश्यकता है।
उन्हें मंदिर ले जाइए, लेकिन केवल हाथ जोड़ना मत सिखाइए—पूछना भी सिखाइए।
उन्हें मंत्र सिखाइए, लेकिन उसके अर्थ पर बात भी कीजिए।
उन्हें दीप जलाना सिखाइए, लेकिन यह भी बताइए कि असली दीप भीतर के अंधकार में जलना चाहिए।
और सबसे महत्वपूर्ण—
उन्हें भगवान से डरना नहीं, भगवान से जुड़ना सिखाइए।
क्योंकि डरकर की गई पूजा मनुष्य को कुछ समय के लिए शांत कर सकती है, लेकिन समझकर की गई पूजा उसके भीतर एक ऐसा प्रकाश जगा सकती है, जिसके सामने डर को बार-बार लौटने की जगह ही न मिले।
डरकर पूजा मत करिए।
पूजा करिए—डर अपने आप मिटने लगेगा।
शायद बच्चों को पूजा से जोड़ने का यही सबसे सुंदर रास्ता है—
कर्मकांड से संवाद की ओर, भय से विश्वास की ओर और बाहर की पूजा से भीतर के प्रकाश की ओर।