सुप्रभातम्: सीता माता धरती में क्यों समा गई थीं?

नीरजा माधव

जब जब माता भूमि: पुत्रोऽहम् पृथिव्या: पढ़ती हूं तब-तब अचानक रामवल्लभा सीता आंखों के सम्मुख मूर्तिमान हो उठती हैं। भारत में शक्ति के अनेक रूप वर्णित हैं। उन सभी में देवी सीता का रूप बिल्कुल अलग है। सीता वास्तव में भूमि पुत्री थीं। हल जोतते समय राजा जनक को मिलीं। उन्होंने पुत्री की तरह पालन किया और राम के साथ विवाह हुआ। जंगल-जंगल राम के साथ भटकने और रावण द्वारा अपहरण के बाद अग्नि परीक्षा तक समर्पित नारी की भूमिका, परंतु अयोध्या वापसी के बाद लोकापवाद से बचने के लिए राम द्वारा उनका परित्याग उनके स्वाभिमान को झकझोरता है और वे दोनों पुत्रों लव-कुश को वीरता का संस्कार दे अपना दायित्व निर्वहन करने के पश्चात राम के पश्चाताप को ठुकराकर धरती में समा जाती हैं।

धरती से प्राप्त हुई सीता पुन: धरती की गोद में चली जाती हैं। मन आकुल हो उठता है। राम ने क्यों किया होगा ऐसा? उनका पश्चाताप सीता के मान को मना सकने में समर्थ क्यों न हो सका? सीता कोमलांगी थीं तो दूसरी ओर शक्ति का पर्याय भी। शिव के धनुष को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर रख देना और उसी के कारण राजा जनक द्वारा धनुषयज्ञ तथा सीता स्वयंवर की घोषणा करना, उसमें अनेक वीर योद्धाओं का परास्त होना, सीता की शक्ति का एक प्रमाण है। ऐसी शक्ति शालिनी सीता धरती में समा जाने का संकल्प मन ही मन क्यों ले लेती हैं? जिस धनुष का भार उठा सकने का पराक्रम वह कर चुकी थीं, स्वयंवर में उसी धनुष को उठाने के लिए आगे आते श्रीराम को देखकर वह अपने इष्टदेव से उस धनुष का वजन कम करने की प्रार्थना करती हैं। ये सारी बातें किसी रहस्य की ओर संकेत करती है।

धरती में इसीलिए समाती हैं सीता

राम सूर्यवंशी हैं। सीता धरती-पुत्री हैं। सूर्य से धरती का संबंध ऊर्जा के बंधन का है। धरती को ऊर्जा सूर्य से प्राप्त होती है। वह सूर्य के चारों ओर डोलती रहती है। इस चक्रमण के कारण ही धरती पर ऋतुएं हैं, दिन-रात हैं, जीवन है, राग रंग है, प्रकृति है। धरती सूर्य से ऊर्जा लेती है और अपने गर्भ से जीव जगत को ऊर्जा देती है। फसलें. वृक्ष, लताएं सभी अपनी जड़ों के माध्यम से धरती से जीवन रस ले पुष्पित पल्लवित होते हैं। सीता धरती की कोख से पैदा हुई उसकी शक्ति हैं। शक्ति या ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती। वह किसी न किसी रूप में बनी रहती है। यह आधुनिक विज्ञान का भी सत्य है। इसीलिए सीता अग्नि परीक्षा में जलकर भस्म नहीं होती। ऊर्जा से ऊर्जा का मिलन होता है और वह एक अदम्य ऊर्जा के रूप में निखरकर विश्व के सामने आती हैं। सीता धरती में इसीलिए समाती हैं कि अनन्य ऊर्जा का स्रोत बन सके।

अंत नहीं, आदि है सीता

एक बीज धरती की कोख में डाला जाता है तो उससे असंख्य बीज पैदा होते हैं और प्रकृति का यह क्रम आगे बढ़ता है। शक्ति इसीलिए स्त्री के रूप में अथवा प्रकृति रूप में वर्णित है। सृष्टि में उसी आदि शक्ति के अनंत कण बिखरे हैं। सीता शक्ति बीज हैं इसीलिए धरती में समाती हैं, अनेक शक्ति-बीजों को जन्म देने के लिए। सूर्य के तेज को धारण कर उसे पुन: बीज रूप बनाने और इस प्रकार सृष्टिक्रम को आगे बढ़ाने के लिए। सीता बीज है, शक्ति है और समस्त स्त्री तत्व उसी आदि शक्ति के अनंत विद्युत्कण। इसीलिए सीता आदि है अंत नहीं। जब तक सृष्टि है, प्रकृति है, स्त्री शक्ति है, सीता का अस्तित्व है। तो विज्ञान या भूगर्भ की बातें यहीं छोड़ती हूं और स्त्रियों के अग्निधर्मा स्वभाव की ओर आती हूं। सीता उसी अग्निधर्मा पृथ्वी की कोख से प्रकट होती है और राम द्वारा अग्नि-परीक्षा के बाद पुन: उनका उद्भव होता है। मैं इस बखेड़े में नहीं पड़ना चाहती कि जिनकी परीक्षा ली गई वह छाया-सीता थी या किसी किसी मत के अनुसार सीता की अग्नि परीक्षा हुई ही नहीं।

हम सब स्त्रियां सीता की बेटियां हैं

प्रसंगत: यहां यह बताना आवश्यक है कि रामेश्वरम् में शिव-मंदिर में दर्शन के लिए जाने से पूर्व सामने लहराते समुद्र में स्नान करना एक परंपरा है और उस स्थान पर समुद्र का नाम अग्नि-तीर्थ है। कहा जाता है कि लंका से वापस आने के पश्चात उसी स्थान पर माता सीता की अग्नि-परीक्षा हुई थी, जिसमें से तपकर और निखरी हुई कुंदन सी सीता बाहर आई थीं। तो सीता पृथ्वी और प्रकृति की पुत्री हैं, पृथ्वी जो कभी अग्नि का गोला थी और सीता अग्नि पुत्री होने के नाते ही मां की गोद से पूर्ण सुरक्षित वापस राम को मिलती हैं। भला मां की गोद में कैसा जीवन-संकट? वह तो दुनिया का सबसे सुरक्षित स्थान है। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं – हम सब सीता के बेटे हैं। यहां यह कहना अधिक उचित होगा कि हम सब स्त्रियां सीता की बेटियां हैं। मेरी यह बात कुछ अति आधुनिकाओं को मान्य नहीं हो सकतीं जो भारतीय परंपरा को पितृसत्तात्मक और स्त्री विरोधी मानती हैं तथा जो अपने पति से अलग अपनी एक स्वतंत्र अस्मिता का आदर्श समाज के सामने रखना चाहती हैं। उनकी दृष्टि में सीता जो स्वयं को अपने पति राम से उसी प्रकार अभिन्न मानती हैं जैसे प्रभा सूर्य से अलग नहीं होती, इसलिए आज भी सीता को आदर्श मानने वाली स्त्रियां अपनी पहचान पति तक ही सीमित रख लेती हैं। उनकी अपनी कोई अलग सत्ता नहीं होती और न ही कोई सामाजिक पहचान।

मौन गुडि़या की तरह नहीं है सीता
ऐसी आधुनिक स्त्रियों से यही कहना है कि अपनी अलग पहचान बनाने के लिए आतुर ऐसी ऐसी आधुनिका लगातार न जाने किस धुंध में खोती जा रही हैं और राम से अपने को अभिन्न मानने वाली सीता अपनी जबरदस्त पहचान के साथ एक युग से दूसरे युग तक अनवरत चली आ रही है। सारे धुंध छंटते जा रहे हैं। एक आधुनिक नारीवादी व्याख्या सीता के मिथक को पितृसत्तात्मक, ब्राह्मणवादी व्यवस्था में स्त्री के मौन से जोड़ती है। पर ध्यान रहे सीता मौन गुडि़या की तरह नहीं वर्णित हैं, भारतीय आर्ष साहित्य में। रावण द्वारा अपहरण करके ले आने और अशोक वाटिका में उसके द्वारा उन्हें सान्विन्स करने की कोशिश करते देख सीता उसके ऊपर बिफर पड़ती है और अपने अपहरणकर्ता की शक्ति की बिना परवाह किए उसे लथाड़ती हैं- ‘खल सुधि नहीं रघुबीर बान की।’ आगे फिर वही सीता कहती है- ‘सठ सूने हरि आनेहि मोही’ अर्थात रे दुष्ट, तूने सूनसान आश्रम से मेरा अपहरण कर लिया। पहले वे रावण को खल कहती हैं और बाद में शठ। लंका के राक्षस राजा को इतने कठोर विशेषणों से सीता निर्भीकतापूर्वक वापरती हैं। यह उनकी चारित्रिक दृढ़ता है। वे भय से रावण के सम्मुख गिड़गिड़ाती या रोती नहीं हैं। एक तृण भी रावण के लिए दुर्लन्ध्य बन जाता है। अन्य स्त्रियों की तरह रावण के आने पर वे लंबा घूंघट नहीं काढतीं। नकाब से भी चेहरा नहीं छिपातीं। एक तृण को ओट बनाती हैं। यह है तेजोमय चेहरा भारतीय स्त्री का। मर्यादा का अतिक्रमण करते ही रावण को जलाकर भस्म कर देने की शक्ति है सीता में क्योंकि अग्नि के गर्भ से उत्पन्न हैं वे।
ओजस्विनी नारी का पर्याय है सीता
पृथ्वी, जो पूर्व में आग का गोला थी, उससे उनका उद्भव होता है। तो आधुनिक पश्चिमी स्त्री विमर्श को अपनाने वाली भारतीय स्त्री जिसे हर तरह की स्वतंत्रता चाहिए, जिसमें अभिव्यक्ति की भी स्वतंत्रता है, को यह जान लेना आवश्यक है कि राम के प्रेम में लीन रहने वाली सीता निर्भय भी है और शत्रु के सम्मुख सच कहने का साहस भी रखती है, वह भी ऐसे समय में जब वह रावण के सम्मुख अकेली और निहत्थी है। शक्ति का अवतार होते हुए भी सीता के हाथों में उस समय कोई हथियार नहीं था, फिर भी वे रावण को खल, शठ और निर्लज्ज जैसे संबोधनों से नवाजती हैं। मैं मुग्ध होती हूं भारतीय स्त्री की इस निर्भीकता पर। याद रहे, जिस युग में रावण को उसके सम्मुख ही खल और शठ जैसे संबोधन सीता देती हैं और ‘तृण धरि ओट कहत वैदेही’ की रामचरितमानस में तुलसी रचना कर रहे थे वह कालखंड की जाति के लिए अनुकूल समय नहीं था। पर्दा प्रथा, सती प्रथा, स्त्री-मर्यादा हनन, मंदिर-ध्वंस, तलवार के बल पर धर्मांतरण जैसी अनेक विकृतियां समाज में व्याप्त थीं। तीर-धनुष वाले भगवान राम के युग का वर्णन करते हुए भी तुलसीदास जी तलवारधारी रावण का वर्णन करते हैं। यह उनके अपने रचना समय की स्थिति थी। तलवार के जोर पर बातें मनवाई जा रहीं थीं।
तुलसीदास का रावण भी सीता के सम्मुख अशोक वाटिका में तलवार लेकर जाता है और जब सीता उसे धिक्कारते हुए कहती हैं-सठ सूने हरि आनेही मोही/अधम निलज्ज लाज नहीं तोही। आपुहिं सुनि खद्योत सम रामुहि भानु समानपरुख वचन सुनि काढि़ असि बोला अति खिसिआन’ अर्थात रावण सीता के कठोर वचनों को सुनकर तलवार निकाल लेता है। यहां यह भी ध्यान देने की बात है कि जिस कालखंड में स्त्रियों के ऊपर घूंघट या बुर्का प्रथा पुरुष प्रधान सत्ता द्वारा लादा गया था उसी कालखंड में सीता एक तिनके को ओट बनाती है और वह तिनका रावण जैसे अत्याचारी के ऊपर भारी पड़ता है। सीता किसी ईजी गर्ल से ऊपर उठकर एक ओजस्विनी नारी का पर्याय बन बैठती है और इस प्रकार समस्त नारी जाति के लिए अभिमान तथा प्रेरणा भी।