योग दिवस विशेष : योग और आयुर्वेद से मिलेगा आरोग्य : डॉ नौटियाल

डॉ जे0एन0 नौटियाल
एम0डी0(आयुर्वेद)
योग और आयुर्वेद से संपूर्ण स्वास्थ्य की परिकल्पना संभव है। आरोग्य पूरे विश्व में वैलनेस के नाम से जाना जाता है और यू0 एन0 ओ0 ने इसे सस्टेनेबल गोल के अंतर्गत रखा है। डब्ल्यूएचओ ने भी स्वास्थ्य की परिभाषा को समय-समय  पर परिवर्तित किया एवं रोग की अनुपस्थिति के साथ ही शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य को कंप्लीट हेल्थ में सम्मिलित किया। आयुर्वेद में भी 5000 साल पूर्व संपूर्ण स्वास्थ्य को कुछ ऐसे बताया गया-

समदोष समागनिश्चय समाधातू मलक्रीय। 

प्रसन्नातमयेइंद्रिय मन स्वस्थ इतिभी धीयेते ।। 

वास्तव में योग और आयुर्वेद हमारे दैनिक जीवन में सम्मिलित थे हमारी प्रत्येक गतिविधि, हमारा किचन, हमारा घर हमारा भोजन पूर्णता आयुर्वेद आधारित था परंतु पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण से हमने अपने इस स्वास्थ्य के ज्ञान को समाप्त कर अपने इर्द गिर्द रोग पैदा करने वाला माहौल तैयार किया। दुनिया में एलोपैथी की सर्जरी एवं इमरजेंसी कि अस्वीकार्यता ने इसे स्वीकार किया और यह अपने शिखर पर पहुंचने लगी लेकिन एलोपैथी के दुष्प्रभाव ड्रग डिपेंडेंस डेटॉल ड्रग रेजिस्टेंस ने बहुत जल्दी पूरी दुनिया में इसकी स्वीकरोक्ति को कम उसी गति से कम भी करना शुरू कर दिया।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने माना कि दुनिया में 70% लोग नॉन कम्युनिकेबल डिजीज से परेशान है और उसने एलोपैथिक दवाओं का कोई रोल नहीं है। इसमें मॉडर्न लाइफस्टाइल, फूड हैबिट को ठीक कर इनसे मुक्ति पाई जा सकती है। इसके लिए पूरे विश्व में वैलनेस की थीम प्रचलित हो रही है। वैलनेस में दुनिया की लगभग सभी चिकित्सा पद्धतियों क एवं लाइफ मॉडिफिकेशन सिस्टम का योगदान है परंतु योग एवं आयुर्वेद का इस नई थीम  में सर्वाधिक योगदान है। यदि योग की बात करें तो यह अब पूरे विश्व में निरापद स्वास्थ्य संरक्षक पद्धति  बनकर उभरी है और इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में इस के समर्थन में ऐतिहासिक 170 देशों ने एक साथ मतदान किया और उसके बाद पूरे विश्व में इस समय योगा की धूम है।

जहां तक आयुर्वेद की बात है यह 5000 साल पुरानी चिकित्सा पद्धति है और यह अपने आप में संपूर्ण चिकित्सा पद्धति है परंतु अपने देश में कभी मुगलों की तो कभी अंग्रेजों ने अपने साथ लाइ अपनी चिकित्सा पद्धति को ही  राज्य आश्रय दिया यही  नहीं बल्कि इस चिकित्सा के संपूर्ण विज्ञान को समाप्त करने के लिए इसके उपलब्ध ज्ञान के भंडार को नष्ट करने तक का कार्य किया और उससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण रहा है कि आजादी के बाद भी सरकारों द्वारा इसको अपेक्षित राज्याश्रय नहीं मिल पाया और इसके ध्वज बाहक आयुर्वेद के चिकित्सकों ने भी एलोपथिक दवाओं का ही सहारा लिया लेकिन आज अगर हम देखें तो इस विज्ञान को आगे बढ़ाने में अपने देश मैं इसका अलग मंत्रालय बना तथा सभी 17 एम्स मैं इसकी स्थापना एक बिभाग के रूप में कई परंतु इससे भी आगे बढ़कर विश्व के विभिन्न देशों ने  शोध एवं परखने के बाद इसकी स्वीकार्यता पूरे विश्व में बनी है  मैं स्वयं कई देशों में इसके प्रचार और प्रसार के लिए भ्रमण कर चुका हूं और वहां के लोगों में इसके प्रति जो लगाव देखा जाता है वह देखते ही बनता है उसका एक कारण एलोपैथी के दुष्प्रभाव भी है।

आज आवश्यकता इस बात की है की आप स्वस्थ कैसे रहें क्योंकि बीमार होने के बाद आपके लिए कई चिकित्सा पद्धतियां कई चिकित्सालय कई बड़े-बड़े इंस्टिट्यूट तैयार हैं और वह आपके एक सामान्य बुखार के लिए कितना पैसा वसूल करते हैं यह सर्वविदित है लेकिन आप बीमार ही  ना हो  इसके लिए सिर्फ और सिर्फ दुनिया में एकमात्र चिकित्सा पद्धति है और वह है आयुर्वेद एवं योग आज योग के द्वारा कई असाध्य रोगों को ठीक किया जा रहा है और आयुर्वेद की सुपर स्पेशलिस्ट ट्रीटमेंट पंचकर्म छार सूत्र मर्म चिकित्सा स्वर्ण प्राशन रक्त मोक्षण आदि से कई असाध्य रोगों का भी इलाज सफलतापूर्वक किया जा रहा है जिसका प्रभाव कोरोना जैसी महामारी में भी सिद्ध हो चुका है।

आज समय की मांग है कि हम आयुर्वेद में वर्णित अपनी दिनचर्या, रात्रि चर्या, आहार बिहार, जीवन शैली  अपनाकर  अपने और अपनो को  सामान्य बीमारी के साथ-साथ महामारी से भी बचाएं। (लेखक सीनियर आयुर्वेदिक फिजिशियन एवं ग्लोबल वेलनेस एक्सपर्ट है) jnayurveda@gmail.com