भारतीय सनातन परंपरा में पंचांग का महत्व अति प्राचीन काल से ही रहा है। यह केवल तिथि और वार जानने का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय कालगणना, ज्योतिष और धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में पंचांग को विशेष स्थान प्राप्त है, क्योंकि इसके माध्यम से तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण जैसे पंच अंगों का ज्ञान होता है.
इसी प्राचीन ज्ञान-परंपरा को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से ‘हिमशिखर खबर’ प्रतिदिन आपके लिए पंचांग प्रस्तुत करता है—ताकि आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच हमारी कालगणना, संस्कृति और सनातन परंपराओं से हमारा जुड़ाव बना रहे.
पंडित उदय शंकर भट्ट
भाद्रपद कृष्ण पक्ष त्रयोदशी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, श्रावण. आज है मास शिवरात्रि.
आज त्रयोदशी तिथि 12:31 PM तक उपरांत चतुर्दशी. नक्षत्र आश्लेषा 03:14 PM तक उपरांत मघा. शिव योग 09:51 PM तक, उसके बाद सिद्ध योग. करण वणिज 12:31 PM तक, बाद विष्टि 11:30 PM तक, बाद शकुनि | आज राहु काल का समय 12:24 PM – 01:56 PM है. आज 03:14 PM तक चन्द्रमा कर्क उपरांत सिंह राशि पर संचार करेगा.
❖ श्रीकृष्ण के जीवन से सीखें ❖
यदि कृष्ण का जन्म अंधकार में हुआ था, तो प्रश्न यह नहीं कि उस रात प्रकाश कहाँ से आया—
प्रश्न यह है कि अंधकार को पहली बार यह आभास कैसे हुआ कि उसके भीतर ही प्रकाश छिपा है?
शायद कृष्ण की कथा का सबसे बड़ा रहस्य यही है—
वे प्रकट हुए, या केवल वह प्रकट हुआ जो सृष्टि के आरंभ से ही अदृश्य रूप में उपस्थित था?
कारागार की बंद दीवारें थीं, पर उन्हें रोक नहीं सकीं।
रात्रि थी, पर वह उनके आने को ढँक नहीं सकी।
यमुना सामने थी, पर उसके प्रवाह ने मार्ग दे दिया।
मानो प्रकृति स्वयं किसी ऐसे आगंतुक को पहचान रही थी, जिसे मनुष्य पहचानने में अभी युगों लगाने वाला था।
कृष्ण आए—पर क्या वे सचमुच कहीं से आए थे?
या वे उसी क्षण प्रकट हुए, जब मनुष्य की चेतना इतनी गहराई तक अंधकार में उतर गई कि उसे अपने भीतर छिपे प्रकाश की आवश्यकता पड़ गई?
यही कृष्ण का रहस्य है।
वे इतिहास में दिखाई देते हैं, लेकिन इतिहास में सीमित नहीं होते।
वे बालक हैं, पर बालक से कहीं अधिक।
वे प्रेम हैं, पर केवल कोमलता नहीं।
वे नीति हैं, पर केवल राजनीति नहीं।
वे युद्धभूमि में खड़े हैं, फिर भी उनका अंतिम संदेश युद्ध से परे है।
वे विरोधाभास नहीं हैं—
वे उन विरोधाभासों के बीच छिपे उस एकत्व का संकेत हैं, जिसे सामान्य दृष्टि देख नहीं पाती।
बांसुरी और सुदर्शन—एक ही हाथ में।
माधुर्य और महाशक्ति—एक ही चेतना में।
रास और रण—एक ही विराट अस्तित्व के दो छोर।
शायद इसलिए कृष्ण को समझना कठिन है।
क्योंकि हम उन्हें बाहर खोजते हैं, जबकि उनका सबसे गहरा निवास मनुष्य के उस अंतरतम में है जहाँ प्रेम और भय, मोह और धर्म, इच्छा और सत्य एक-दूसरे से संघर्ष करते हैं।
और जब उस भीतर के कुरुक्षेत्र में सब दिशाएँ धुंधली हो जाती हैं, तब एक प्रश्न उठता है—
“जो मुझे प्रिय है, क्या वही सत्य है?”
कृष्ण का उत्तर शायद शब्दों में नहीं आता।
वह भीतर किसी बहुत पुराने मौन की तरह उतरता है—
प्रिय को नहीं, सत्य को चुनो।
भय को नहीं, धर्म को चुनो।
मोह को नहीं, उस चेतना को चुनो जो तुम्हें तुम्हारे वास्तविक स्वरूप तक ले जाए।
शायद कृष्ण का जन्म इसी क्षण फिर होता है—
जब मनुष्य के भीतर सत्य, अपने ही अंधकार से जन्म लेने लगता है।