भारतीय सनातन परंपरा में पंचांग का महत्व अति प्राचीन काल से ही रहा है। यह केवल तिथि और वार जानने का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय कालगणना, ज्योतिष और धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में पंचांग को विशेष स्थान प्राप्त है, क्योंकि इसके माध्यम से तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण जैसे पंच अंगों का ज्ञान होता है.
इसी प्राचीन ज्ञान-परंपरा को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से ‘हिमशिखर खबर’ प्रतिदिन आपके लिए पंचांग प्रस्तुत करता है—ताकि आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच हमारी कालगणना, संस्कृति और सनातन परंपराओं से हमारा जुड़ाव बना रहे.
पंडित उदय शंकर भट्ट
भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वादशी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, श्रावण. आज है भौम प्रदोष व्रत और प्रदोष व्रत.
आज द्वादशी तिथि 02:43 PM तक उपरांत त्रयोदशी. नक्षत्र पुष्य 04:39 PM तक उपरांत आश्लेषा. परिघ योग 12:40 AM तक, उसके बाद शिव योग. करण तैतिल 02:43 PM तक, बाद गर 01:35 AM तक, बाद वणिज. आज राहु काल का समय 03:29 PM – 05:01 PM है. आज चन्द्रमा कर्क राशि पर संचार करेगा.
❖ भजन का वह रहस्य जो क्लेश मिटाता है ❖
मनुष्य के भीतर एक ऐसी जगह है,
जहाँ संसार की कोई आवाज़ नहीं पहुँचती।
न वहाँ प्रशंसा का शोर है,
न अपमान की प्रतिध्वनि।
न वहाँ संबंधों की भीड़ है,
न इच्छाओं का बाजार।
फिर भी, आश्चर्य यह है कि मनुष्य का सबसे बड़ा शोर वहीं उठता है।
वहीं कोई अनाम-सी बेचैनी जन्म लेती है।
वहीं बिना किसी कारण आँखें उदास हो जाती हैं।
वहीं सब कुछ होते हुए भी कुछ छूट जाने का भय बना रहता है।
और वहीं, संसार की सारी उपलब्धियों के बीच, एक प्रश्न बार-बार उठता है—
“आखिर भीतर यह अशांति क्यों है?”
मनुष्य उस प्रश्न का उत्तर बाहर खोजता है।
वह घर बदलता है,
लोग बदलता है,
परिस्थितियाँ बदलता है,
धन जुटाता है,
सम्मान प्राप्त करता है,
सुख के नए-नए साधन खोजता है।
लेकिन कुछ समय बाद उसे अनुभव होता है कि—
जिससे वह भाग रहा था, वह उसके पीछे नहीं था।
वह उसके भीतर था।
एक अदृश्य गाँठ की तरह।
उसे न आँखें देख सकती हैं,
न हाथ छू सकते हैं,
फिर भी वही गाँठ कभी भय बनकर,
कभी क्रोध बनकर,
कभी मोह बनकर,
कभी अहंकार बनकर
और कभी किसी अपने को खो देने की आशंका बनकर
मनुष्य को भीतर से बाँधती रहती है।
शास्त्रों ने इस अदृश्य बंधन को एक नाम दिया है—
क्लेश।
कितना रहस्यमय शब्द है—
क्लेश।
बाहर से देखें तो लगता है कि किसी घटना ने हमें दुःखी किया।
किसी व्यक्ति ने हमें ठेस पहुँचाई।
किसी परिस्थिति ने हमें तोड़ दिया।
लेकिन थोड़ा भीतर उतरकर देखें तो पता चलता है—
घटना केवल बाहर घटी थी,
उसकी पीड़ा भीतर पैदा हुई।
और शायद यही वह स्थान है, जहाँ से आध्यात्मिक यात्रा आरंभ होती है।
क्योंकि यदि पीड़ा बाहर होती,
तो बाहर की वस्तु बदलते ही समाप्त हो जाती।
परंतु ऐसा नहीं होता।
एक इच्छा पूरी होती है, दूसरी जन्म ले लेती है।
एक भय समाप्त होता है, दूसरा सामने खड़ा हो जाता है।
एक संबंध मिलता है, तो उसे खोने का डर शुरू हो जाता है।
एक उपलब्धि मिलती है, तो उसके छिन जाने की चिंता साथ आ जाती है।
मानो मनुष्य के भीतर कोई ऐसी शक्ति बैठी हो,
जो उसे निरंतर किसी न किसी चीज़ से बाँधे रखना चाहती हो।
योगशास्त्र इस रहस्य के और भीतर जाता है।
वह कहता है—
क्लेश केवल दुःख नहीं है।
क्लेश वह मूल संस्कार है, जहाँ से दुःख बार-बार जन्म लेता है।
उसके पाँच प्रमुख रूप हैं—
अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश।
अविद्या—जब सत्य सामने होते हुए भी हम असत्य को सत्य मान लें।
अस्मिता—जब ‘मैं’ इतना प्रबल हो जाए कि परमात्मा के लिए भीतर कोई स्थान ही न बचे।
राग—जब सुख हमें बाँध ले।
द्वेष—जब दुःख हमारे भीतर विष बनकर ठहर जाए।
और अभिनिवेश—जब मृत्यु का भय जीवन से भी अधिक शक्तिशाली हो जाए।
इन पाँचों को ध्यान से देखें तो एक अद्भुत बात दिखाई देती है—
मनुष्य का बंधन बाहर की वस्तुओं से कम,
उनके प्रति उसकी अपनी धारणाओं से अधिक है।
तो फिर प्रश्न उठता है—
यदि रोग भीतर है,
तो औषधि कहाँ है?
यदि गाँठ भीतर बंधी है,
तो उसे खोलेगा कौन?
यदि मनुष्य स्वयं ही अपने क्लेश का कारण बन रहा है,
तो उसे अपने ही भीतर से मुक्ति का मार्ग कौन दिखाएगा?
यहीं शास्त्र एक अत्यंत सूक्ष्म द्वार खोलते हैं—
भजन का द्वार।
श्रीरामचरितमानस में काकभुशुंडि जी गरुड़ जी से कहते हैं—
“ऐसिहिं हरि बिनु भजन खगेसा।
मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा॥”
हे पक्षीराज! श्रीहरि के भजन के बिना जीवों का क्लेश नहीं मिटता।
लेकिन इन शब्दों को केवल सुन लेना पर्याप्त नहीं।
क्योंकि यदि हम भजन का अर्थ ही सीमित कर दें,
तो संभव है कि हम उस द्वार के सामने खड़े होकर भी उसके भीतर प्रवेश न कर पाएँ।
भजन आखिर है क्या?
क्या यह केवल नाम का उच्चारण है?
क्या यह केवल माला के मनकों की यात्रा है?
क्या यह मंदिर में जलता हुआ दीपक है?
या फिर—
भजन वह रहस्य है, जिसमें ईश्वर का स्मरण धीरे-धीरे मनुष्य के स्वभाव में उतर जाता है?
शायद यहीं से भजन का वास्तविक अर्थ खुलना शुरू होता है।
जब नाम केवल जिह्वा पर नहीं रहता,
बल्कि दृष्टि बन जाता है।
जब “हरि” केवल पुकार नहीं रहते,
बल्कि प्रत्येक जीव में दिखाई देने लगते हैं।
जब पूजा केवल वेदी पर नहीं होती,
बल्कि किसी भूखे की थाली के सामने भी होती है।
तब भजन का अर्थ बदल जाता है।
तब किसी भूखे को अन्न देना केवल दान नहीं रह जाता—
वह भजन बन जाता है।
और अन्न को व्यर्थ न करना केवल संयम नहीं रह जाता—
वह भी भजन बन जाता है।
क्योंकि जिस क्षण हमें यह अनुभव होने लगता है कि इस संसार में कुछ भी केवल “मेरा” नहीं है, उसी क्षण भजन की पहली किरण भीतर उतरती है।
अन्न का एक दाना भी तब केवल दाना नहीं रहता।
उसमें धरती दिखाई देती है।
उसमें किसान का श्रम दिखाई देता है।
उसमें सूर्य दिखाई देता है।
वर्षा दिखाई देती है।
प्रकृति का अनुग्रह दिखाई देता है।
और अंततः—
उसमें वही दिखाई देता है, जिसका नाम लेकर हम मंदिर में सिर झुकाते हैं।
यहीं से भजन जप से जीवन बनता है।
और शायद यहीं से वह अदृश्य गाँठ भी खुलने लगती है,
जिसे हम इतने वर्षों से संसार के बाहर खोजते रहे थे।
क्योंकि—
जिस हृदय में हरि का स्मरण जाग जाता है,
वहाँ धीरे-धीरे ‘मैं’ का अंधकार कम होने लगता है।
और जहाँ ‘मैं’ कम होता है,
वहीं से क्लेश का अंत आरंभ होता है।