कलियुग के जागृत देवता : हनुमान

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.

भाद्रपद शुक्ल पक्ष एकादशी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, भाद्रपद. आज है पार्ष्व एकादशी.

आज एकादशी तिथि 09:43 PM तक उपरांत द्वादशी. नक्षत्र उत्तराषाढ़ा 07:06 AM तक उपरांत श्रवण. अतिगण्ड योग 04:28 PM तक, उसके बाद सुकर्मा योग. करण वणिज 08:56 AM तक, बाद विष्टि 09:43 PM तक, बाद बव | आज राहु काल का समय 03:19 PM – 04:49 PM है. आज चन्द्रमा मकर राशि पर संचार करेगा.

एक देवता, जो मंदिर में नहीं—मनुष्य की जागती हुई चेतना में प्रकट होते हैं

मनुष्य की सबसे बड़ी दुर्बलता यह नहीं कि उसके पास शक्ति कम है। उसकी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह अपनी ही शक्ति से अनजान है।

समुद्र सामने हो और दृष्टि केवल अपने पैरों तक सीमित हो जाए, तो कुछ योजन की दूरी भी असंभव दिखाई देती है। लेकिन जिस क्षण दृष्टि क्षितिज को पहचान लेती है, उसी क्षण समुद्र दूरी नहीं रहता—मार्ग बन जाता है।

रामकथा में हनुमान का समुद्र लांघना इसी गहरे सत्य का प्रतीक है।

हनुमान के भीतर शक्ति पहले से थी। किसी ने उन्हें शक्ति दी नहीं; उन्हें केवल उनकी विस्मृत शक्ति का स्मरण कराया गया। जामवंत ने जब उनके भीतर सोई हुई सामर्थ्य को पुकारा, तब जैसे चेतना के भीतर कोई द्वार खुल गया। और फिर वह हुआ जिसे भारतीय मानस सहस्राब्दियों से विस्मय, श्रद्धा और विश्वास के साथ स्मरण करता आया है—हनुमान ने समुद्र लांघ दिया।

परंतु मेरे लिए इस प्रसंग का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि हनुमान ने समुद्र कैसे लांघा।

प्रश्न यह है—

हम अपने भीतर के समुद्र को कब लांघेंगे?

भय का समुद्र।
संशय का समुद्र।
असफलता का समुद्र।
अहंकार का समुद्र।
और सबसे बड़ा—अपनी सीमाओं के बारे में स्वयं बना लिया गया भ्रम।

यहीं से हनुमान की कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं रह जाती। वह मनुष्य की आत्मयात्रा बन जाती है।

हनुमान—शक्ति का नहीं, शक्ति के जागरण का नाम

हमने हनुमान को महाबली कहा। उनकी भुजाओं में अपार सामर्थ्य देखी। उनके पराक्रम के आख्यान सुने। किंतु यदि उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति खोजनी हो, तो वह उनकी भुजाओं में नहीं मिलेगी।

वह मिलेगी—समर्पण में।

हनुमान की शक्ति में ‘मैं’ का अहंकार नहीं था। उनकी शक्ति का केंद्र स्वयं हनुमान नहीं, राम थे।

वे पर्वत उठा सकते थे, समुद्र पार कर सकते थे, लंका में प्रवेश कर सकते थे, अग्नि के बीच निर्भय खड़े रह सकते थे; लेकिन इन सभी सामर्थ्यों के बीच उनका ‘मैं’ कहीं दिखाई नहीं देता।

उनके प्रत्येक कर्म का एक ही केंद्र था—

रामकाज।

यहीं हनुमान और रावण के बीच वह सूक्ष्म, किंतु निर्णायक अंतर दिखाई देता है।

रावण के पास शक्ति थी, ज्ञान था, तप था, वैभव था; किंतु उसकी शक्ति के केंद्र में ‘मैं’ था।

हनुमान के पास भी शक्ति थी, ज्ञान था, सामर्थ्य था; किंतु उनके केंद्र में ‘राम’ थे।

एक की शक्ति स्वयं को सिद्ध करने में लगी थी, दूसरे की शक्ति स्वयं को मिटाकर किसी महान उद्देश्य को सिद्ध करने में।

यहीं से शक्ति और अहंकार के बीच की वह महीन रेखा दिखाई देती है, जिसे मनुष्य अक्सर भूल जाता है।

भक्ति का चरम—जहाँ भक्त स्वयं को भूल जाता है

सामान्य मनुष्य ईश्वर से कुछ मांगता है।

भक्त ईश्वर को अपना मानता है।

लेकिन हनुमान की भक्ति इससे भी आगे जाती है—

उन्होंने स्वयं को ही राम का मान लिया।

यही समर्पण का चरम है।

जब ‘मैं’ और ‘मेरा’ धीरे-धीरे पिघलने लगते हैं, तब भक्ति जन्म लेती है। और जब मनुष्य अपने अस्तित्व को किसी उच्चतर सत्य के चरणों में रख देता है, तब उसके भीतर एक ऐसी निर्भयता जन्म लेती है जिसे बाहरी परिस्थितियां आसानी से विचलित नहीं कर सकतीं।

हनुमान का साहस केवल शारीरिक साहस नहीं था। वह विश्वास से जन्मा साहस था।

जब कर्म किसी बड़े सत्य को समर्पित हो जाए, तब परिणाम का भय धीरे-धीरे कम होने लगता है। असफलता भी अनुभव बन जाती है, संघर्ष साधना बन जाता है और सेवा स्वयं में साध्य बन जाती है।

मनुष्य के भीतर छिपी विराट संभावना

यदि हनुमान की कथा को भीतर की यात्रा की तरह पढ़ें, तो यह वास्तव में मनुष्य की अपनी चेतना की कथा है।

बाल हनुमान का सूर्य को फल समझकर उसकी ओर दौड़ना केवल एक अद्भुत पौराणिक प्रसंग नहीं है। उसमें उस बाल चेतना की झलक भी दिखाई देती है जिसकी सीमाएं अभी समाज, परिस्थितियों और भय ने तय नहीं की हैं।

फिर जीवन आगे बढ़ता है।

मनुष्य सुनता है—

तुम इतना ही कर सकते हो।
तुम्हारी क्षमता सीमित है।
तुम्हारे पास साधन नहीं हैं।
परिस्थितियां तुम्हारे विरुद्ध हैं।
दूसरे तुमसे आगे निकल चुके हैं।

और धीरे-धीरे बाहरी आवाजें भीतर की आवाज को दबा देती हैं।

मनुष्य अपनी वास्तविक क्षमता से नहीं, अपनी कल्पित सीमाओं से जीने लगता है।

इसलिए हनुमान का समुद्र लांघना केवल समुद्र पार करने की कथा नहीं है।

यह मनुष्य को उसके भीतर से पुकारता हुआ एक प्रश्न है—

क्या तुमने अपने बारे में जो मान लिया है, क्या वास्तव में तुम उतने ही हो?

शायद नहीं।

शायद मनुष्य अपनी वर्तमान परिस्थिति से कहीं बड़ा है।

शायद उसकी सबसे बड़ी शक्ति अभी जागनी बाकी है।

कलियुग में हनुमान की आवश्यकता

कलियुग का सबसे बड़ा अंधकार बाहर नहीं, भीतर है।

आज मनुष्य के पास विज्ञान है, तकनीक है, सूचना है, साधन हैं। संसार को जोड़ने के असंख्य माध्यम हैं। फिर भी मनुष्य स्वयं से दूर होता जा रहा है।

वह हजारों लोगों से जुड़ा दिखाई देता है, लेकिन अपने अंतर्मन से उसका संवाद टूटता जा रहा है।

उसके पास सूचना बहुत है, दिशा कम।

सुविधाएं बहुत हैं, संतोष कम।

गति बहुत है, ठहराव कम।

और संपर्क बहुत है, आत्मीयता कम।

ऐसे समय में हनुमान का स्मरण केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं रह जाता। वह आत्मअनुशासन, साहस, सेवा और चेतना का प्रतीक बन जाता है।

हनुमान मानो मनुष्य से कहते हैं—

शरीर को सक्षम बनाओ।
मन को स्थिर करो।
बुद्धि को निर्मल करो।
और जीवन को किसी श्रेष्ठ उद्देश्य से जोड़ो।

इसीलिए विद्यार्थी उन्हें बुद्धि और एकाग्रता के प्रतीक के रूप में स्मरण करते हैं, युवा साहस और ऊर्जा के रूप में और साधक भक्ति एवं समर्पण के रूप में।

संयम से जन्मती है शक्ति

भारतीय चिंतन ने शक्ति को कभी केवल बाहुबल नहीं माना।

शक्ति का एक गहरा स्रोत है—संयम।

आहार में संयम।
विचार में संयम।
वाणी में संयम।
इंद्रियों पर संयम।
और कर्म में अनुशासन।

जिस शक्ति को दिशा नहीं मिलती, वही शक्ति विनाश का कारण भी बन सकती है।

हनुमान की महानता केवल इस बात में नहीं कि उनके पास अपार शक्ति थी। उनकी महानता इस बात में थी कि उस शक्ति पर उनका संयम था।

उनकी शक्ति को दिशा देता था—विवेक।

उनकी गति को उद्देश्य देता था—रामकाज।

और उनके कर्म को पवित्रता देती थी—निष्ठा।

यही वह शिक्षा है जिसकी आज सबसे अधिक आवश्यकता है।

युवा चेतना के लिए हनुमान

आज का युवा केवल सफलता नहीं चाहता। वह अपने जीवन का अर्थ भी खोजता है। वह पहचान चाहता है, उद्देश्य चाहता है और ऐसी उपलब्धि चाहता है जिसके पीछे कोई सार्थकता हो।

हनुमान युवा चेतना के सामने इसी कारण एक गहरा आदर्श रखते हैं।

वे बताते हैं—

प्रतिभा से अधिक महत्वपूर्ण है उसका सही उपयोग।

सामर्थ्य से अधिक महत्वपूर्ण है अनुशासन।

सफलता से अधिक महत्वपूर्ण है चरित्र।

और उपलब्धि से अधिक महत्वपूर्ण है—उस उपलब्धि का लोकहित में उपयोग।

अपनी ऊर्जा को बिखरने मत दो।
उसे दिशा दो।

अपनी प्रतिभा को अहंकार मत बनने दो।
उसे सेवा बना दो।

अपनी सफलता को केवल अपना मत समझो।
उसे समाज के लिए उपयोगी बनाओ।

तभी शक्ति सार्थक होगी।

प्रकृति के साथ सामंजस्य

हनुमान का चरित्र हमें मनुष्य और प्रकृति के उस प्राचीन संबंध की भी याद दिलाता है, जिसे आधुनिक जीवन ने कहीं पीछे छोड़ दिया है।

पर्वत, वन, आकाश, समुद्र—हनुमान की कथा का संसार प्रकृति से गहरे जुड़ा हुआ है।

आज मनुष्य प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की भाषा बोलते-बोलते स्वयं प्रकृति के संकटों से घिर गया है।

हनुमान का जीवन हमें दूसरी दृष्टि देता है—

प्रकृति पर विजय नहीं, प्रकृति के साथ सामंजस्य।

शायद यही कारण है कि भारतीय परंपरा में प्रकृति केवल संसाधन नहीं रही; वह जीवन की सहयात्री रही है।

शक्ति से बड़ी है चरित्र की शक्ति

आज ज्ञान प्राप्त करना कठिन नहीं है।

एक स्पर्श में संसार की सूचनाएं सामने आ जाती हैं।

कठिन है—अपने भीतर ऐसा चरित्र बनाना जो उस ज्ञान का सही उपयोग कर सके।

हनुमान इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि वे केवल शक्तिशाली नहीं हैं—वे चरित्रवान हैं।

उनके व्यक्तित्व में शक्ति के साथ विनम्रता है, साहस के साथ विवेक है, गति के साथ अनुशासन है और भक्ति के साथ सेवा है।

वचनपालन, निष्ठा, संयम, विनय और उत्तरदायित्व—ये उनके चरित्र की वे धाराएं हैं जिनसे उनकी शक्ति पवित्र होती है।

इसलिए हनुमान की कथा केवल पराक्रम की कथा नहीं है।

वह चरित्र निर्माण की पाठशाला भी है।

हनुमान को खोजने की दिशा बाहर नहीं, भीतर है

हनुमान को खोजने के लिए केवल दूर किसी तीर्थ पर जाना आवश्यक नहीं।

मंदिर में उनकी प्रतिमा के सामने खड़ा होना श्रद्धा है; लेकिन अपने भीतर उनके गुणों को जागृत करना साधना है।

जब भय के सामने साहस खड़ा होता है—वह हनुमान हैं।

जब शक्ति के सामने विनय खड़ी होती है—वह हनुमान हैं।

जब सफलता के सामने अहंकार झुक जाता है—वह हनुमान हैं।

जब स्वार्थ से ऊपर उठकर मनुष्य किसी दूसरे के लिए जीने लगता है—वह हनुमान हैं।

और जब ‘मैं’ धीरे-धीरे मिटकर ‘सेवा’ बन जाता है—वहीं हनुमान की चेतना जागती है।

इस अर्थ में हनुमान किसी एक युग के देवता नहीं हैं।

वे उस चेतना के प्रतीक हैं जो हर युग में मनुष्य को उसकी विस्मृत शक्ति का स्मरण कराती है।

हनुमान का संदेश—जागो

हनुमान का सबसे गहरा संदेश शायद यही है—

जागो।

अपने भीतर के भय से जागो।

अपनी विस्मृत शक्ति से जागो।

अपने विवेक से जागो।

अपने कर्तव्य से जागो।

और अंततः उस आत्मतत्त्व से जागो जो परिस्थितियों से बड़ा है।

मंदिरों में हनुमान की प्रतिमाएं स्थिर हैं, लेकिन उनका संदेश स्थिर नहीं।

वह आज भी चलता है।

वह समय की दीवारों को पार करता हुआ मनुष्य के भीतर दस्तक देता है—

तुम उतने दुर्बल नहीं हो, जितना तुम्हारा भय तुम्हें बताता है।

तुम अपनी परिस्थितियों से बड़े हो।

तुम्हारे भीतर ऐसी शक्ति है जिसे जागने के लिए केवल स्मरण, अनुशासन और सही दिशा चाहिए।

लेकिन वह शक्ति केवल अपने लिए मत जगाओ।

उसे लोकमंगल के लिए समर्पित करो।

शायद यही हनुमान की साधना का सबसे गहरा रहस्य है।

शक्ति मिले तो विनम्र रहो।

सफलता मिले तो सेवक बने रहो।

सामर्थ्य मिले तो निर्बल के काम आओ।

और जीवन मिले तो उसे केवल अपने लिए मत जियो।

यही वह बिंदु है जहां भक्ति कर्म बनती है, शक्ति सेवा बनती है और मनुष्य साधारण जीवन से उठकर अर्थपूर्ण जीवन की ओर बढ़ता है।

उपसंहार

हनुमान का अमरत्व उनकी देह में नहीं, उस चेतना में है जिसे उन्होंने जगाया।

देह समय के साथ बदलती है।

साम्राज्य मिट जाते हैं।

यश के स्वर धीमे पड़ जाते हैं।

लेकिन जो चेतना मनुष्य को सत्य, साहस, सेवा, संयम और समर्पण की ओर ले जाती है, वह समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होती जाती है।

इसीलिए हनुमान केवल कलियुग के जागृत देवता नहीं हैं।

वे मनुष्य के भीतर जागने वाली उस अमर चेतना का नाम हैं, जो उसे उसकी सीमाओं से उठाती है, उसके भय से मुक्त करती है और अंततः उसे स्वयं से आगे किसी महान सत्य की ओर ले जाती है।

हनुमान को बाहर खोजने से पहले भीतर खोजिए।

हो सकता है, जिस शक्ति के लिए आप संसार भर में भटक रहे हों, उसका स्रोत आपके भीतर ही सोया पड़ा हो।

किसी जामवंत की प्रतीक्षा मत कीजिए।

अपने भीतर की आवाज सुनिए।

अपने भीतर के समुद्र को पहचानिए।

और फिर एक दिन—

विश्वास के साथ पहला कदम उठाइए।

क्योंकि समुद्र के उस पार केवल लंका नहीं थी।

वहां हनुमान की अपनी विस्मृत शक्ति उनका इंतजार कर रही थी।

और शायद हमारे भीतर भी।