आज का पंचांग : कामना का जन्म कहाँ होता है?

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.

तिथि
तिथिकृष्ण सप्तमी
32:0:32
नक्षत्रमृगशिरा
26:56:54
योगव्यतिपात
18:17:10
करणविष्टि
21:7:53
सूर्योदय एवं चन्द्रोदय
  सूर्योदय6:18:42
  सूर्यास्त18:13:30
  चन्द्रोदय22:42:6
  चन्द्रास्त11:58:44
  हिन्दु सूर्योदय6:22:22
  हिन्दु सूर्यास्त18:9:49
हिन्दू मास एवं वर्ष
विक्रम संवत2083 सिद्धार्थशक संवत1948 प्रभाउ
पक्षकृष्ण पक्षअयनदक्षिणायन
पूर्णिमांतअश्विनअमांतभाद्रपद
सूर्य राशिकन्याचंद्र राशिवृष
शुभ समय (शुभ मुहूर्त)
अभिजीत मुहूर्त11:53 – 12:39
अशुभ समय (अशुभ मुहूर्त)
राहु काल10:46:45 – 12:16:06
गुलिक काल07:48:03 – 09:17:25
यमघण्ट काल15:14:48 – 16:44:09

कामना का जन्म कहाँ होता है?

भाई कमलानंद जी की कलम से

मनुष्य अक्सर सोचता है—
“मेरे भीतर यह चाहत आई कहाँ से?”

कल तक जिस वस्तु की कोई आवश्यकता नहीं थी, आज उसके बिना मन बेचैन क्यों है?
जिस चेहरे को कल तक देखा भी नहीं था, आज वही बार-बार स्मरण में क्यों आता है?
जिस सुख के बारे में कभी सोचा तक नहीं था, आज उसे पाने की इतनी तीव्र आकांक्षा क्यों होने लगी?

जरा ठहरकर देखिए…

कामना अचानक भीतर पैदा नहीं होती।
उसका कोई बीज बाहर से भीतर आता है।

हमारी आँखों ने कुछ देखा, कानों ने कुछ सुना, मन ने किसी को देखा और उसकी चमक को अपने भीतर जगह दे दी।
बस, यहीं से यात्रा शुरू हो जाती है।

एक सुंदर चेहरा देखा—वह भीतर उतर गया।
किसी की शानदार गाड़ी देखी—उसकी चाह भीतर जन्म लेने लगी।
किसी का वैभव देखा, किसी की प्रतिष्ठा देखी, किसी का जीवन देखा—और मन ने चुपचाप कह दिया,
“यह मेरे पास भी होना चाहिए।”

फिर बाहर की वह वस्तु बाहर नहीं रहती।

मन की चक्की उसे पीसती है, उसके साथ कल्पनाएँ जोड़ती है, उसे बार-बार दोहराती है और धीरे-धीरे उसी से कामना का निर्माण हो जाता है।

फिर वही कामना मनुष्य को चलाने लगती है।

जिसे हमने एक क्षण के लिए देखा था, वह हमारे भीतर बैठकर हमें वर्षों तक दौड़ा सकती है।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि
“कामना को कैसे दबाएँ?”

प्रश्न तो इससे पहले का है—

“मैंने उसे अपने भीतर प्रवेश ही क्यों करने दिया?”

क्योंकि दबाई हुई कामना समाप्त नहीं होती।
वह भीतर दबकर किसी और रूप में बाहर आ सकती है और मन को और अधिक अशांत कर सकती है।

इसलिए जब कोई सुंदर चेहरा दिखाई दे, कोई आकर्षक वस्तु दिखाई दे, किसी का वैभव दिखाई दे—तो उसे देखने में दोष नहीं है।

बस वहीं एक जागृति आवश्यक है—

“यह बाहर का विषय है, इसे बाहर ही रहने दो।
मैं इसे अपने भीतर क्यों लेकर जाऊँ?”

लेकिन बात यहीं पूरी नहीं होती।

यदि भीतर रिक्तता है, तो बाहर की वस्तुएँ बहुत जल्दी भीतर जगह बना लेती हैं।
खाली मन संसार से भरना चाहता है।

इसलिए भीतर को खाली मत छोड़िए।

उसे परमात्मा के नाम से भरिए।
उसे प्रभु की स्मृति से भरिए।
उसे प्रेम, करुणा, संतोष और आत्मबोध से भरिए।

जिस हृदय में परमात्मा की अनुभूति का रस बह रहा हो, जिस मन में नाम-जप की धारा चल रही हो, वहाँ बाहर की वस्तुएँ आएँगी भी तो मन उन्हें पकड़कर कामना में बदलने के लिए उतना आतुर नहीं होगा।

भीतर क्या भरा है, यही तय करता है कि बाहर से आने वाली चीज़ भीतर क्या बनाएगी।

इसलिए संसार को छोड़ने की आवश्यकता नहीं है—
संसार को भीतर बसाने की आदत छोड़ने की आवश्यकता है।

बाहर संसार रहे,
भीतर भगवान रहें।

यही कामना से मुक्ति की शुरुआत है।