आज का पंचांग : मन की अपूर्णता

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.

कार्तिक कृष्ण पक्ष तृतीया, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, आश्विन.

आज तृतीया तिथि 01:06 AM तक उपरांत चतुर्थी | नक्षत्र कृत्तिका 01:26 PM तक उपरांत रोहिणी | व्यातीपात योग 07:18 AM तक, उसके बाद वरीयान योग 03:40 AM तक, उसके बाद परिघ योग | करण वणिज 02:37 PM तक, बाद विष्टि 01:07 AM तक, बाद बव | आज राहु काल का समय 12:10 PM – 01:34 PM है | आज चन्द्रमा वृषभ राशि पर संचार करेगा.

मन की अपूर्णता

मन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि उसे कितना भी मिल जाए, वह फिर भी किसी न किसी अभाव का अनुभव करता रहता है। एक इच्छा पूरी होती है, तो दूसरी जन्म ले लेती है। एक मंजिल मिलती है, तो मन नई मंजिल की तलाश में निकल पड़ता है। इस अंतहीन दौड़ में मनुष्य सब कुछ जुटाने में लगा रहता है, लेकिन अपने भीतर झाँकना भूल जाता है।

आनंद साधनों की प्रचुरता में नहीं, साधना की गहराई में है। मनुष्य के रूप में जन्म लेना प्रकृति का उपहार है, लेकिन जीवन को आनंदमय बनाना एक कला है, जिसे हमें सीखना पड़ता है। पशु-पक्षियों को देखिए, वे भविष्य की चिंता में अपना वर्तमान नष्ट नहीं करते। प्रकृति की गोद में रहकर वे अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप जीवन जीते हैं। मनुष्य के पास बुद्धि है, विवेक है और चुनाव की स्वतंत्रता है, फिर भी वह अपनी इच्छाओं का ऐसा बंदी बन जाता है कि जीवन की सहज सुंदरता से दूर होता चला जाता है।

सच तो यह है कि अभाव बाहर कम और भीतर अधिक होते हैं। जिसके मन में तृप्ति है, उसे सीमित साधनों में भी संतोष मिल जाता है; लेकिन जिसके भीतर अतृप्ति का अंधकार है, उसके लिए संसार की समस्त संपदा भी अपर्याप्त है। बाहरी समृद्धि जीवन को सुविधाजनक बना सकती है, लेकिन आंतरिक समृद्धि ही उसे आनंदमय बनाती है।

जीवन अपने मूल स्वरूप में इतना कष्टप्रद नहीं है, जितना हम अपनी अनियंत्रित इच्छाओं, वासनाओं, अपेक्षाओं और तुलना की प्रवृत्ति से बना लेते हैं। हम दूसरों से अधिक पाने की होड़ में अपने पास जो है, उसका आनंद लेना भूल जाते हैं। संग्रह करते-करते जीवन बीत जाता है, पर तृप्ति का क्षण फिर भी नहीं आता। वस्तुओं का संग्रह बढ़ता जाता है और मन की शांति घटती जाती है।

संग्रह करना बुरा नहीं, लेकिन संग्रह को ही जीवन का उद्देश्य बना लेना आत्मविस्मृति है। आवश्यकता की पूर्ति जीवन का सहज धर्म है, जबकि असीमित इच्छाओं की तुष्टि एक ऐसी दौड़ है, जिसकी कोई अंतिम रेखा नहीं होती।

जिस दिन मनुष्य इच्छाओं और आवश्यकताओं के बीच का अंतर समझ लेता है, उसी दिन उसके भीतर स्वतंत्रता का जन्म होने लगता है। वह जीवन से भागता नहीं, बल्कि जीवन को उसकी सहजता में स्वीकार करना सीखता है। उसके लिए सुख भविष्य में मिलने वाली किसी उपलब्धि का नाम नहीं रहता, बल्कि वर्तमान में उपलब्ध जीवन के प्रति कृतज्ञता का भाव बन जाता है।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि हमारे पास कितना है, बल्कि यह है कि जो हमारे पास है, उसके साथ हम कितने संतुष्ट हैं। जीवन की वास्तविक संपन्नता तिजोरियों में नहीं, हृदय की विशालता में है। सच्चा सुख अधिक पाने में नहीं, अनावश्यक चाहतों से मुक्त होने में है।

जिसने अपनी आवश्यकताओं को समझ लिया, उसने जीवन को सरल बना लिया; और जिसने अपने मन को तृप्त करना सीख लिया, उसने सुख का वास्तविक रहस्य जान लिया।

क्योंकि मन की अपूर्णता संसार को बदलने से नहीं, अपने भीतर जागने से मिटती है।