पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
पुकार और प्रार्थना
प्रार्थना शब्दों से भी हो सकती है, किंतु केवल शब्द कभी प्रार्थना नहीं हो सकते। शब्दों का उच्चारण और प्रार्थना की अनुभूति दो भिन्न अवस्थाएँ हैं। प्रार्थना शब्दों के समूह का नाम नहीं, अपितु अंतःकरण की एक विशिष्ट भावदशा का नाम है। वह अवस्था, जहाँ वाणी मौन होने लगती है, किंतु हृदय की अभिव्यक्ति अपने चरम पर पहुँच जाती है। जहाँ हमारे कहे-अनकहे भाव भी प्रभु के सम्मुख स्वतः उद्घाटित होने लगते हैं। भावजगत में प्रभु की सजीव उपस्थिति का अनुभव ही प्रार्थना है।
पुकार और प्रार्थना के बीच एक सूक्ष्म अंतर है। पुकार में कोई आग्रह होता है, कोई अपेक्षा होती है, किसी अभाव की पूर्ति की आकांक्षा होती है। हम प्रभु को पुकारते हैं, क्योंकि हमें उनसे कुछ चाहिए; किंतु प्रार्थना उस अवस्था का नाम है, जहाँ प्रभु की कृपा का बोध होते ही माँगने की वृत्ति क्षीण होने लगती है। जहाँ हृदय में किसी अपेक्षा का आग्रह नहीं, बल्कि जो कुछ प्राप्त है, उसके प्रति अगाध धन्यता और कृतज्ञता का भाव शेष रह जाता है।
प्रार्थना वह नहीं, जिसमें हम प्रभु को अपनी इच्छाओं की सूची सुनाते रहें। प्रार्थना तो वह है, जब जीवन में जो कुछ मिला है, उसके लिए अंतःकरण अहोभाव से भर उठे। जब बिना किसी विशेष कारण के भी आँखें सजल हो जाएँ, हृदय कृतज्ञता से द्रवित हो उठे और भीतर से केवल इतना भाव उमड़े कि हे प्रभु! आपकी कृपा के अतिरिक्त मेरा अपना कुछ भी नहीं है।
पुकार में मन की आकांक्षाएँ मुखर होती हैं, जबकि प्रार्थना में आत्मा की मौन अनुभूति प्रकट होती है। पुकार में हम प्रभु तक अपनी बात पहुँचाना चाहते हैं, प्रार्थना में हम स्वयं को उनकी उपस्थिति में अनुभव करने लगते हैं। पुकार में हमारी दृष्टि उस पर होती है, जो हमें प्राप्त नहीं हुआ; प्रार्थना में हमारी दृष्टि उस अनंत कृपा पर टिक जाती है, जो बिना माँगे ही निरंतर बरस रही है।
जैसे-जैसे हृदय की अपेक्षाएँ क्षीण होती हैं, वैसे-वैसे कृतज्ञता गहन होती जाती है। जैसे-जैसे शब्दों का आग्रह मिटता है, वैसे-वैसे मौन मुखर होने लगता है। और जब अहंकार की अंतिम परत भी विलीन होने लगती है, तब प्रार्थना किसी क्रिया का नाम नहीं रह जाती; वह हमारे होने की सहज अवस्था बन जाती है।
पुकार में हम प्रभु को आवाज देते हैं, प्रार्थना में उनके मौन को सुनने लगते हैं। पुकार में हम उन्हें खोजते हैं, प्रार्थना में अनुभव करते हैं कि वे तो सदा से हमारे भीतर उपस्थित हैं।
शायद प्रार्थना की पूर्णता यही है— न कोई माँग, न कोई शिकायत, न कोई अपेक्षा; केवल अहोभाव, केवल समर्पण और केवल उस परम सत्ता के प्रति अनंत कृतज्ञता, जिसकी कृपा से हमारा होना भी संभव हुआ है।
🪷 जब माँग समाप्त होकर धन्यवाद बन जाए, जब शब्द मौन होकर भाव बन जाएँ और जब स्मरण सहज होकर प्रेम बन जाए— तभी पुकार प्रार्थना में रूपांतरित होती है। 🪷