पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
भाद्रपद शुक्ल पक्ष पंचमी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, भाद्रपद.
आज पंचमी तिथि 08:59 AM तक उपरांत षष्ठी. नक्षत्र विशाखा 05:22 PM तक उपरांत अनुराधा. वैधृति योग 12:22 PM तक, उसके बाद विष्कुम्भ योग. करण बालव 08:59 AM तक, बाद कौलव 09:50 PM तक, बाद तैतिल | आज राहु काल का समय 12:21 PM – 01:52 PM है. आज 10:49 AM तक चन्द्रमा तुला उपरांत वृश्चिक राशि पर संचार करेगा.
स्वयं की सलाह लें
कभी स्वयं के सामने पूरी ईमानदारी से खड़े होकर स्वीकार कीजिए कि हमारे जीवन की हर परेशानी के लिए परिस्थितियाँ जिम्मेदार नहीं होतीं। कुछ उलझनें हमने स्वयं पैदा की हैं, कुछ अवसर हमने अपने भय के कारण खोए हैं, कुछ निर्णय हमने दूसरों को प्रसन्न करने के लिए लिए हैं और कुछ सपने इसलिए अधूरे छोड़ दिए क्योंकि हमें अपने ही सामर्थ्य पर विश्वास नहीं था।
यह स्वीकार करना आसान नहीं है।
दूसरों की गलती स्वीकार करना सरल है, परिस्थितियों को दोष देना सरल है, भाग्य को जिम्मेदार ठहराना सरल है; लेकिन एक दिन शांत होकर स्वयं से यह कहना कि—
“हाँ, यहाँ मुझसे भी भूल हुई थी…”
शायद जीवन का सबसे कठिन, लेकिन सबसे सुंदर आत्ममंथन है।
क्योंकि जिस क्षण मनुष्य अपनी गलती को स्वीकार करता है, उसी क्षण उसके भीतर परिवर्तन की पहली किरण जन्म लेती है। आत्मस्वीकृति हार नहीं है; यह स्वयं को फिर से उठाने की शुरुआत है।
हममें से कितने लोग ऐसे हैं जो बाहर से मुस्कुराते हुए भीतर से किसी अधूरे निर्णय, किसी असफलता, किसी पछतावे या किसी दबे हुए सपने का बोझ लिए चलते रहते हैं। हम दुनिया से कहते रहते हैं—“सब ठीक है।” लेकिन रात के सन्नाटे में हमारा अपना अंतर्मन जानता है कि सब कुछ ठीक नहीं है।
और शायद सबसे बड़ा प्रश्न यही है—
क्या हमने कभी स्वयं से सच कहा है?
क्या हमने स्वीकार किया है कि हम थके हुए हैं?
कि कहीं हम गलत दिशा में जा रहे हैं?
कि कुछ रिश्तों में हमने भी भूल की है?
कि कुछ अवसर हमारी प्रतीक्षा करते रहे और हम भय के कारण आगे नहीं बढ़ पाए?
कि दूसरों से शिकायत करने से पहले हमें स्वयं से भी कुछ प्रश्न पूछने चाहिए?
आत्ममंथन का अर्थ स्वयं को कठघरे में खड़ा करना नहीं है।
आत्ममंथन का अर्थ है—बिना किसी बहाने के स्वयं को स्वीकार करना।
जो हैं, उसे स्वीकार करना।
जहाँ हैं, उसे स्वीकार करना।
जो खोया, उसे स्वीकार करना।
जहाँ गलती हुई, उसे स्वीकार करना।
और फिर उसी स्वीकार से एक नई शुरुआत करना।
शायद जीवन में सबसे बड़ी क्रांति तब नहीं होती जब परिस्थितियाँ बदलती हैं; बल्कि तब होती है जब मनुष्य स्वयं के प्रति ईमानदार हो जाता है।
तभी उसे समझ आता है कि दूसरे व्यक्ति उसे सलाह दे सकते हैं, रास्ता दिखा सकते हैं, अनुभव बाँट सकते हैं; लेकिन उसके जीवन का निर्णय, उसके संघर्ष का सामना और उसके भविष्य का निर्माण अंततः उसे स्वयं ही करना होगा।
जब कभी जीवन आपके सामने कोई कठिन प्रश्न रखे, तो तुरंत किसी और के पास उत्तर खोजने मत जाइए। कुछ देर रुकिए। मौन में बैठिए। और फिर आइने के सामने जाकर स्वयं से पूछिए—
“क्या मैं अपने जीवन के प्रति ईमानदार हूँ?”
“जो बदलना चाहता हूँ, उसके लिए मैंने स्वयं क्या किया?”
“जिस जीवन की शिकायत करता हूँ, उसे बदलने के लिए मेरा अगला कदम क्या है?”
हो सकता है, आइना आपको कोई नया उत्तर न दे।
लेकिन वह आपको उस व्यक्ति से अवश्य मिला देगा, जिसके हाथ में आपके जीवन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है—आप स्वयं।
दूसरे आपका मार्ग प्रकाशित कर सकते हैं,
लेकिन कदम आपको उठाना होगा।
दूसरे आपका हाथ थाम सकते हैं,
लेकिन यात्रा आपको करनी होगी।
दूसरे आपके आँसू पोंछ सकते हैं,
लेकिन फिर से मुस्कुराने का निर्णय आपको स्वयं लेना होगा।
इसलिए जीवन में कभी-कभी संसार की सलाह से पहले स्वयं की सलाह लें।
अपने भीतर बैठे उस शांत स्वर को सुनें, जिसे दुनिया के शोर में आपने बहुत दिनों से अनसुना कर रखा है।
क्योंकि संभव है, जिस उत्तर के लिए आप वर्षों से बाहर भटक रहे हैं, वह आपके भीतर पहले से मौजूद हो।
बस उसे सुनने के लिए
आपको स्वयं के सामने
पूरी तरह सच होकर खड़ा होना पड़ेगा।