आज का पंचांग : सामर्थ्य समाप्त होने पर कृपा शुरू होती है

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है

पंडित उदय शंकर भट्ट

आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है।

आज आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी, सिद्धार्थ संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत विश्वावसु 1947, भाद्रपद | आज है रोहिणी व्रत, कालाष्टमी

आज अष्टमी तिथि 03:06 AM तक उपरांत नवमी | नक्षत्र रोहिणी 08:41 AM तक उपरांत म्रृगशीर्षा | वज्र योग 07:35 AM तक, उसके बाद सिद्धि योग 04:55 AM तक, उसके बाद व्यातीपात योग | करण बालव 04:02 PM तक, बाद कौलव 03:06 AM तक, बाद तैतिल | आज राहु काल का समय 04:56 PM – 06:27 PM है | आज 08:03 PM तक चन्द्रमा वृषभ उपरांत मिथुन राशि पर संचार करेगा |

  1. विक्रम संवत – 2082, सिद्धार्थ
  2. शक सम्वत – 1947, विश्वावसु
  3. पूर्णिमांत – आश्विन
  4. अमांत – भाद्रपद

तिथि

  1. कृष्ण पक्ष अष्टमी   – Sep 14 05:04 AM – Sep 15 03:06 AM
  2. कृष्ण पक्ष नवमी   – Sep 15 03:06 AM – Sep 16 01:31 AM

नक्षत्र

  1. रोहिणी – Sep 13 10:11 AM – Sep 14 08:41 AM
  2. म्रृगशीर्षा – Sep 14 08:41 AM – Sep 15 07:31 AM

सामर्थ्य समाप्त होने पर कृपा शुरू होती है

जो लोग अतिरिक्त रूप से योग्य होते हैं, वो अतिरिक्त रूप से अशांत भी हो जाते हैं। ऐसे परेशान लोगों के लिए तुलसीदास जी ने एक तरीका बताया है। अगर वो इसे अपनाते हैं, तो वो योग्यता का लाभ तो उठाएंगे पर उनको हानि नहीं मिलेगी। राम जी के गुरु वशिष्ठ जी ने कहा था- ‘सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित।। दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई।।’

वही सर्वज्ञ है, तत्वज्ञ है, पंडित है, गुणों का घर है और अखंड विज्ञानवान है, चतुर और सब सुलक्षणों से युक्त है, जिसका आपके चरण-कमलों में प्रेम है। ये पांच बातें जिस किसी के भीतर हों, उसे अतिरिक्त रूप से योग्य मानना चाहिए।

और जब वो अशांत हो तो तुलसीदास जी ने इशारा किया है, ईश्वर के चरणों में प्रेम रखें। इसका मतलब एक ऐसी शक्ति पर भरोसा रखो, जो आपकी सारी योग्यता के ऊपर है। जब सामर्थ्य समाप्त हो जाती है, तो उसकी कृपा शुरू होती है। खूब आगे बढ़िए और शांत भी रहिए।

आज का विचार

कर्मों का हिसाब भी बड़ा निराला है, ये आपसे वो सब छीन लेता है जिसे आपने बड़ा सहेज के रखा था और आपको वो सब दे देता है जो आपने कभी सोचा भी नहीं था


आज का भगवद् चिन्तन

कृपा का स्वरूप

प्रायः लोग भौतिक सुख साधनों की प्राप्ति को ही दैवीय कृपा समझते हैं। केवल भौतिक उपलब्धियों को प्रभु कृपा का स्वरूप नहीं समझना चाहिए। कृपा का वास्तविक अर्थ बाहर की प्राप्ति नहीं अपितु भीतर की तृप्ति है। किसी को भौतिक सुखों की प्राप्ति हो जाना यह कृपा हो न हो लेकिन किसी को बाहरी सुखों की प्राप्ति न होने पर भी भीतर एक तृप्ति बनी रहना यह अवश्य प्रभु की बड़ी कृपा है।

जिस जीवन में प्रभु चरणों का विश्वास होगा वहाँ रिक्तता नहीं हो सकती है, वहाँ तो आनंद ही आंनद होता है। आपके पुरुषार्थ से और प्रारब्ध से आपको प्राप्ति तो संभव है, लेकिन तृप्ति नहीं, वह तो केवल और केवल प्रभु कृपा से ही संभव है। अतः भीतर की तृप्ति, भीतर की धन्यता और भीतर का अहोभाव, यही उस प्रभु की सबसे बड़ी कृपा है। अभाव में भी स्वभाव में प्रसन्न एवं आनंदित रहना ही तो कृपा का स्वरूप है।