पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है | ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, ‘हिमशिखर खबर‘ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
प्रभात चिंतन
क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति
विज्ञाय चार्थ भते न कामात्।
नासम्पृष्टो व्युपयुङ्क्ते परार्थे
तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य।।
भावार्थ:- ज्ञानी लोग किसी भी विषय को शीघ्र समझ लेते हैं, लेकिन उसे धैर्यपूर्वक देर तक सुनते रहते हैं। किसी भी कार्य को कर्तव्य समझकर करते है, कामना समझकर नहीं और व्यर्थ किसी के विषय में बात नहीं करते।
धर्म एवं अधर्म के बीच का अंतर बड़ा सूक्ष्म होता है। अच्छे उद्देश्य से किया गया गलत कार्य भी धर्म है और गलत उद्देश्य से किया गया अच्छा कार्य भी अधर्म है।
स्मरण रहे! युद्ध हमेशा दोनों पक्षों की हानि कराता है। विजेता की हानि को निवेश कहते हैं और हारने वाले के लिए यह दुर्भाग्य होता है। विजेता के पाप भुला दिए जाते हैं और उसके साथ ही हारने वाले के पुण्य भी। इसीलिए विजय पर ध्यान देना चाहिये ताकि दुर्भाग्य को निवेश में बदला जा सके। धर्मयुद्ध में पक्ष और विपक्ष का सूक्ष्मता से ज्ञान होना आवश्यक है। कभी कभी नारायणी सेना भी दुर्योधन की ओर से लड़ने लगती है तो कभी कभी धृतराष्ट्र पुत्र युयुत्सु ठीक युद्ध से पूर्व युधिष्ठिर की ओर सम्मिलित हो जाता है। कुछ लोग बलराम और विदुर की भांति सक्षम होते हुए भी सद्भावना से कारण दोनों पक्षों को छोड़ देते हैं तो कुछ लोग रुक्मी की भांति दुर्भावना से कैतवलीला (कपट वंचना) करते हैं।
कर्ण सूर्य पुत्र था,परन्तु अन्धे धृतराष्ट्र के पुत्र की सेवा करता था। अर्थात अन्धकार को पोषण पहुंचाता था।
इसके विपरित त्रेता में सूर्यपुत्र सुग्रीव भी थे, उन्होंने सूर्यवंश में उत्पन्न भगवान राम की सेवा में लगे रहे। अर्थात प्रकाश ने प्रकाश का साथ दिया।
कहने का अर्थ है कि प्रकाश जब अन्धकार का साथ देने लगे तो वह प्रकाश नहीं रह जाता, ऐसे प्रकाश का उच्छेद आवश्यक हो जाता है,और श्री भगवान ने उसका उच्छेद कर/करा दिया।
आज अपने प्रभु से वैचारिक मानसिकता मे परिपक्वता और सन्मार्ग देते रहने की अलौकिक प्रार्थना के साथ ।
“कमला (पद्मिनी) एकादशी व्रत कथा”
युधिष्ठिर ने पूछा – भगवन् ! अब मैं श्रीविष्णु के व्रतों में उत्तम व्रत का, जो सब पापों को हर लेने वाला तथा व्रती मनुष्यों को मनोवांछित फल देने वाला हो, श्रवण करना चाहता हूँ।
जनार्दन! पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) की एकादशी की कथा कहिए, उसका क्या फल है ? और उसमें किस देवता का पूजन किया जाता है?
प्रभो ! किस दान का क्या पुण्य है? मनुष्यों को क्या करना चाहिए? उस समय कैसे स्नान किया जाता है ? किस मन्त्र का जप होता है ? कैसी पूजन-विधि बताई गई है ?
पुरुषोत्तम ! पुरुषोत्तम मास में किस अन्न का भोजन उत्तम है ?
भगवान् श्रीकृष्ण बोले – राजेद्र ! अधिक मास आने पर जो एकादशी होती है, वह कमला एकादशी नाम से प्रसिद्ध है। यह तिथियों में उत्तम तिथि है। उसके व्रत के प्रभाव से लक्ष्मी अनुकूल होती हैं। उस दिन ब्रह्म-मुहूर्त में उठकर भगवान् पुरुषोत्तम का स्मरण करे और विधिपूर्वक स्नान करके व्रती पुरुष व्रत का नियम ग्रहण करे। घर पर जप करने का एक गुना, नदी के तट पर दूना, गौशाला में सहस्त्रगुना, अग्निहोत्र गृह में एक हजार एक सौ गुना, शिव के क्षेत्रॉ में, तीथॉ में, देवताओं के निकट तथा तुलसी के समीप लाख गुना और भगवान् विष्णु के निकट अनन्त गुना फल होता है।
अवन्तीपुरी में शिवशर्मा नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे, उनके पाँच पुत्र थे। इनमें जो सबसे छोटा था, वह पापाचारी हो गया; इसलिए पिता तथा स्वजनों ने उसे त्याग दिया। अपने बुरे कर्म के कारण निर्वासित होकर वह बहुत दूर वन में चला गया। दैवयोग से एक दिन वह तीर्थराज प्रयाग में जा पहुँचा। भूख से दुर्बल शरीर और दीन मुख लिये उसने त्रिवेणी में स्नान किया। फिर क्षुधा से पीड़ित होकर वह यहाँ मुनियों के आश्रम खोजने लगा।
इतने में उसे वहाँ हरिमित्र मुनि का उत्तम आश्रम दिखायी दिया। पुरुषोत्तम मास में वहाँ बहुत-से मनुष्य एकत्रित हुए थे। आश्रम पर पापनाशक कथा कहने वाले ब्राह्मणों के मुख से उसने श्रद्धापूर्वक कमला एकादशी की महिमा सुनी, जो परम पुण्यमयी तथा भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली है। जय शर्मा ने विधिपूर्वक कमला एकादशी की कथा सुनकर उन सबके साथ मुनि के आश्रम पर ही व्रत किया।
जब आधी रात हुई तो भगवती लक्ष्मी उसके पास आकर बोलीं— ‘बृह्मन्! इस समय कमला एकादशी के व्रत के प्रभाव से मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ और देबाधिदेव श्रीहरि की आज्ञा पाकर बैकुण्ठधाम से आयी हूँ। मैं तुम्हें वर दूँगी।
ब्राह्मण बोला – माता लक्ष्मी! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो वह व्रत बताइए, जिसकी कथा-वार्ता में साधु-ब्राह्मण सदा संलग्न रहते हैं।
लक्ष्मी ने कहा -ब्राह्मण ! एकादशी-व्रत का माहात्म्य श्रोताओं के सुनने योग्य सर्वोत्तम विषय है। यह पवित्र वस्तुओ में सबसे उत्तम है। इससे दुःस्वप्र का नाश तथा पुण्य की प्राप्ति होती है, अतः इसका यत्नपूर्वक श्रवण करना चाहिये। उत्तम पुरुष श्रद्धा से युक्त हो एक या आधे श्लोक का पाठ करने से भी करोड़ों महापातकों से तत्काल मुक्त हो जाता है। जैसे मासों में पुरुषोत्तम मास, पक्षियों में गरुड़ तथा नदियों में गंगा श्रेष्ठ हैं; उसी प्रकार तिथियों में द्वादशी तिथि उत्तम है । समस्त देवता आज भी [एकादशी व्रत के ही लोभ से] भारतवर्ष में जन्म लेने की इच्छा रखते हैं।
देवगण सदा ही रोग-शोक से रहित भगवान् नारायण का पूजन करते हैं। जो लोग मेरे प्रभु भगवान् नारायण के नाम का सदा भक्तिपूर्वक जप करते हैं, उनकी ब्रह्मा आदि देवता सर्वदा पूजा करते हैं। जो लोग श्रीहरि के नाम-जप में संलग हैं, उनकी लीला-कथाओं के कीर्तन में तत्पर हैं तथा निरन्तर श्रीहरि की पूजा में ही प्रवृत्त रहते हैं; वे मनुष्य कलियुग में कृतार्थ हैं।
यदि दिन में एकादशी और द्वादशी हो तथा रात्रि बीतते-बीतते त्रयोदशी आ जाये तो उस त्रयोदशी के पारण में सौ यज्ञों का फल प्राप्त होता है। व्रत करने वाला पुरुष चक्र सुदर्शनधारी देवाधिदेव श्री विष्णु के समक्ष निम्नांकित मन्त्र का उच्चारण करके भक्ति भाव से संतुष्ट चित्त होकर उपवास करें। वह मन्त्र इस प्रकार है –
एकादश्या निराहार:. स्थित्वाहमपरेऽहनि ॥
भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं में भवाच्युत ॥
कमलनयन ! भगवान् अच्युत ! मैं एकादशी को निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूँगा। आप मुझे शरण दें।
तत्पश्चात् व्रत करने वाला मनुष्य मन और इन्द्रियों को वश में करके गीत, वाद्य, नृत्य और पुराण-पाठ आदि के द्वारा रात्रि में भगवान के समक्ष जागरण करें। फिर द्वादशी के दिन उठकर स्नान के पश्चात् जितेन्द्रिय भाव से विधिपूर्वक श्री विष्णु की पूजा करें।
एकादशी को पंचामृत से जनार्दन को नहलाकर द्वादशी को केवल दूध में स्नान कराने से श्रीहरि का सायुज्य प्राप्त होता है। पूजा करके भगवान से इस प्रकार प्रार्थना करें –
अज्ञानतिमिरान्थस्या व्रतेनानेन. केशव।
प्रसीद सुमुखो भूत्वा ज्ञानदृष्टिप्रदों भव॥
(६४। ३९)
केशव ! मैं अज्ञानरूपी रतौंधी से अंधा हो गया हूँ। आप इस व्रत से प्रसन्न हों और प्रसन्न होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करें।
इस प्रकार देवताओं के स्वामी देवाधिदेव् भगवान् गदाधर से निवेदन करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों कों भोजन कराये तथा उन्हें दक्षिणा दे। उसके बाद भगवान् नारायण के शरणागत होकर बलि वैश्व देव की विधि से पञ्च महायज्ञों का अनुष्ठान करके स्वयं मौन हो अपने बन्धु- बान्धवों के साथ भोजन करे।
इस प्रकार जो शुद्ध भाव से पुण्यमय एकादशी का व्रत करता है, वह पुनरावृत्ति से रहित वैकुण्ठ धाम को प्राप्त होता है।
भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं – राजन् ! ऐसा कहकर लक्ष्मी देवी उस ब्राह्मण को वरदान दे अंतर्ध्यान हो गईं। फिर वह ब्राह्मण भी धनी होकर पिता के घर पर आ गया। इस प्रकार जो कमला एकादशी का उत्तम व्रत करता है तथा एकादशी के दिन इसका माहात्म्य सुनता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।
आज का भगवद् चिन्तन
सबसे सीख लें
हमारे जीवन में किसी जीते हुए व्यक्ति का अनुभव अनमोल और आवश्यक है, लेकिन किसी हारे हुए की सलाह भी बड़ी महत्व की होती है। हारे हुए को लक्ष्य की प्राप्ति भले न हुई हो लेकिन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उसके द्वारा किया गया संघर्ष भी बहुत बड़ी प्रेरणा प्रदान कर जाता है। लक्ष्य की ओर संघर्ष पथ पर बढ़ते हुए कठिनाइयों के पड़ावों से प्राप्त अनुभव भी जीवन को बहुत कुछ सिखा देते हैं।
विजयी व्यक्ति का अनुभव अवश्य ही विजय की सीख प्रदान करता है, लेकिन हारे हुए व्यक्ति की सलाह से ही समझ आता है, कि क्या-क्या गलतियाँ रही अथवा हार के क्या-क्या कारण रहे, जिनसे बचकर अब लक्ष्य तक पहुँचा जा सके। हारे हुए व्यक्ति से सलाह लेकर, जीते हुए व्यक्ति से अनुभव लेकर और स्वयं की बुद्धिमत्ता का प्रयोग करने वाला व्यक्ति जीवन पथ में कभी भी असफल नहीं हो सकता है।

श्री सालासर बालाजी मंदिर
आज का पंचांग
सूर्योदय एवं चन्द्रोदय
| सूर्योदय | 05:38 ए एम | सूर्यास्त | 07:21 पी एम |
|---|---|---|---|
| चन्द्रोदय | 04:01 पी एम | चन्द्रास्त | 03:14 ए एम, मई 28 |
पञ्चाङ्ग
चन्द्र मास, सम्वत एवं बृहस्पति संवत्सर विक्रम सम्वत 2083 का मन्त्री मण्डल
| विक्रम सम्वत | 2083 सिद्धार्थी | बृहस्पति संवत्सर | सिद्धार्थी – 03:53 पी एम, अप्रैल 21, 2026 तक |
|---|---|---|---|
| शक सम्वत | 1948 पराभव | रौद्र | |
| गुजराती सम्वत | 2082 पिङ्गल | चन्द्रमास | ज्येष्ठ (अधिक) – पूर्णिमान्त |
| प्रविष्टे/गते | 13 | ज्येष्ठ (अधिक) – अमान्त | |
| राजा | गुरु – शासन व्यवस्था के स्वामी | सेनाधिपति | चन्द्र – रक्षा मन्त्री एवं सेनानायक |
| मन्त्री | मंगल – नीतियों एवं प्रशासन के स्वामी | धान्याधिपति | बुध – रबी की फसलों के स्वामी |
| सस्याधिपति | गुरु – खरीफ की फसलों के स्वामी | मेघाधिपति | चन्द्र – मेघ एवं वर्षा के स्वामी |
| धनाधिपति | गुरु – धन एवं कोष के स्वामी | नीरसाधिपति | गुरु – धातु, खनिज आदि के स्वामी |
| रसाधिपति | शनि – रस एवं द्रव पदार्थों के स्वामी | फलाधिपति | चन्द्र – फल-पुष्पादि के स्वामी |
राशि तथा नक्षत्र
| चन्द्र राशि | कन्या – 07:00 पी एम तक | नक्षत्र पद | हस्त – 05:56 ए एम तक |
|---|---|---|---|
| तुला | चित्रा – 12:27 पी एम तक | ||
| सूर्य राशि | वृषभ | चित्रा – 07:00 पी एम तक | |
| सूर्य नक्षत्र | रोहिणी | चित्रा – 01:33 ए एम, मई 28 तक | |
| सूर्य नक्षत्र पद | रोहिणी | चित्रा |
ऋतु तथा अयन
| द्रिक ऋतु | ग्रीष्म | दिनमान | 13 घण्टे 42 मिनट्स 52 सेकण्ड्स |
|---|---|---|---|
| वैदिक ऋतु | ग्रीष्म | रात्रिमान | 10 घण्टे 16 मिनट्स 49 सेकण्ड्स |
| द्रिक अयन | उत्तरायण | मध्याह्न | 12:29 पी एम |
| वैदिक अयन | उत्तरायण |
शुभ समय
| ब्रह्म मुहूर्त | 04:16 ए एम से 04:57 ए एम | प्रातः सन्ध्या | 04:36 ए एम से 05:38 ए एम |
|---|---|---|---|
| अभिजित मुहूर्त | कोई नहीं | विजय मुहूर्त | 02:47 पी एम से 03:41 पी एम |
| गोधूलि मुहूर्त | 07:20 पी एम से 07:40 पी एम | सायाह्न सन्ध्या | 07:21 पी एम से 08:23 पी एम |
| अमृत काल | 01:09 ए एम, मई 28 से 02:54 ए एम, मई 28 | निशिता मुहूर्त | 12:09 ए एम, मई 28 से 12:50 ए एम, मई 28 |
| सर्वार्थ सिद्धि योग | 05:38 ए एम से 05:56 ए एम | रवि योग | 05:38 ए एम से 05:56 ए एम |