पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
तिथि-नक्षत्र-योग-करण
| तिथि | चतुर्थी 29 सित 05:10 PM – 30 सित 02:55 PM |
| ➡ तिथि | पंचमी तक 01 अक्तू 12:35 PM |
| पक्ष | कृष्ण पक्ष |
| नक्षत्र | भरणी 29 सित 09:03 AM – 30 सित 07:36 AM |
| ➡ नक्षत्र | कृत्तिका तक 01 अक्तू 06:02 AM |
| योग | वज्र (तक 12:20 AM) |
| करण | बालव |
| वार | बुधवार |
🌅 सूर्योदय व समय
| सूर्योदय | 06:14 AM |
| सूर्यास्त | 06:09 PM |
| चंद्रोदय | 08:26 PM |
| चंद्रास्त | 09:52 AM |
| दिनमान | 11 घंटे 55 मिनट |
| सूर्य राशि | कन्या |
| चंद्र राशि | मेष (01:13 PM तक, फिर वृष) |
🗓 संवत्सर व मास
| मास (पूर्णिमांत) | आश्विन |
| मास (अमांत) | भाद्रपद |
| ऋतु | शरद |
| अयन | दक्षिणायन |
| विक्रम संवत | 2083 सिद्धार्थी |
| शक संवत | 1948 |
⚠ अशुभ काल
| राहुकाल | 12:11 PM – 01:40 PM |
| यमगंड | 07:43 AM – 09:12 AM |
| गुलिक | 10:42 AM – 12:11 PM |
| दिशाशूल | उत्तर |
दिन चौघड़िया
लाभ06:14 AM–07:43 AM
अमृत07:43 AM–09:12 AM
काल09:12 AM–10:42 AM
शुभ10:42 AM–12:11 PM
रोग12:11 PM–01:40 PM
उद्वेग01:40 PM–03:10 PM
चर03:10 PM–04:39 PM
लाभ04:39 PM–06:09 PM
आज का भगवद् चिंतन
स्वरूप बोध
स्वरूप-बोध ही मानव जीवन के परम सुख का मूल आधार है। जिस प्रकार शीतलता जल का सहज स्वभाव है, उसी प्रकार शांति भी हमारे आत्मस्वरूप की सहज अवस्था है। शांति को कहीं बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं है; वह तो हमारे अंतःकरण में सदैव विद्यमान है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानें।
इंद्रियों की चंचलता, मन की विषयासक्ति और संसार के प्रति हमारी आसक्ति ही हमें अपने निज स्वरूप से विमुख करती है। हम बाहर की वस्तुओं में सुख और शांति खोजते रहते हैं, जबकि जिस आनंद की तलाश में भटक रहे हैं, उसका स्रोत स्वयं हमारे भीतर स्थित है।
कपड़ों में चमक साबुन से उत्पन्न नहीं होती; साबुन तो केवल उन पर लगी मलिनता को दूर करता है। उसी प्रकार साधना हमारे भीतर शांति का निर्माण नहीं करती, बल्कि अज्ञान, अहंकार, वासना और विकारों के आवरण को हटाकर हमारे सहज शांत स्वरूप का बोध कराती है।
औषधि रोग की निवृत्ति के लिए होती है, स्वास्थ्य प्रदान करने के लिए नहीं; क्योंकि स्वास्थ्य तो शरीर की स्वाभाविक अवस्था है। उसी प्रकार शांति और आनंद आत्मा का सहज स्वरूप हैं। हमें इन्हें प्राप्त नहीं करना है, बल्कि उन आवरणों को हटाना है, जिनके कारण हम अपने ही स्वरूप से अनभिज्ञ बने हुए हैं।
जीवन-पथ पर चलते हुए जैसे सड़क पर हमें स्वयं वाहनों से सावधान रहकर अपना संरक्षण करना पड़ता है, वैसे ही जीवन में उत्पन्न होने वाले क्रोध, कलह, क्लेश, मोह और अहंकार से भी विवेकपूर्वक स्वयं को बचाना होगा। परिस्थितियाँ हमारे वश में नहीं होतीं, किंतु उन परिस्थितियों में हमारा मन किस अवस्था में रहे—यह साधना और विवेक से निश्चित किया जा सकता है।
एक कुशल नाविक की भाँति जीवनरूपी नौका को संसार की तीव्र धाराओं में सावधानीपूर्वक चलाते रहो। विवेक को पतवार, धैर्य को आधार और प्रभु-स्मरण को अपना मार्गदर्शक बनाकर निरंतर आगे बढ़ते रहो। बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, भीतर का दीपक बुझने न पाए।
क्योंकि अंततः साधना किसी नई वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि अपने उस शाश्वत स्वरूप में जागरण है, जहाँ न अशांति है, न अभाव—केवल शांति, प्रेम और आनंद का अखंड प्रकाश है।
स्वरूप को जानो, स्वयं में ठहरो और प्रभु के उस शाश्वत आनंद का अनुभव करो, जो सदैव तुम्हारे भीतर विद्यमान है।