सभी मित्रों को भाई कमलानंद का प्रणाम।
अभी मैं लंदन में हूँ।
हजारों किलोमीटर दूर बैठा हूँ, लेकिन मन बार-बार अपने गांवों, अपने खेतों, अपने युवाओं और उन लोगों के पास चला जाता है, जिनके भीतर प्रतिभा तो है, पर अवसर नहीं।
आज चौधरी जी से लंबी बातचीत हुई।
बात एक छोटे-से विचार से शुरू हुई—‘पशु मित्र’ को नया रूप दिया जा सकता है।
लेकिन बातचीत आगे बढ़ी तो लगा कि यह केवल पशुओं की सेवा का विषय नहीं है। यह तो गांव के पुनर्जागरण और नई ग्रामीण नेतृत्व-व्यवस्था की शुरुआत बन सकता है।
प्रश्न यह नहीं है कि सरकार हमारे लिए क्या करेगी?
प्रश्न यह है—हम अपने गांव के लिए क्या कर सकते हैं?
हम कब तक रोजगार मांगते रहेंगे?
कब तक गांव से शहर और शहर से विदेश जाने को ही विकास मानते रहेंगे?
कब तक गांव की खाली पड़ी जमीन, बंद पड़े घर, उपेक्षित तालाब, स्थानीय हुनर और हमारी अपनी प्रतिभाएं यूं ही पड़ी रहेंगी?
और सबसे बड़ा प्रश्न—
क्या हमारे गांवों में नेतृत्व की कमी है, या हमने नेतृत्व को पहचानना ही बंद कर दिया है?
मुझे लगता है, नेतृत्व की कमी नहीं है।
हमें केवल अच्छे लोगों को पहचानना, जोड़ना और उन्हें काम देना है।
गोरखपुर से क्यों नहीं?
गोरखपुर इस प्रयोग का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। गीता प्रेस की वैचारिक विरासत, आयुर्वेद से जुड़ी गतिविधियां, बड़ी आबादी और पूर्वांचल की सामाजिक ऊर्जा—इन सबको एक साथ जोड़कर एक ऐसा मॉडल बनाया जा सकता है जो केवल गोरखपुर का न रहे।
गोरखपुर प्रयोगशाला बने और गांव उसका विश्वविद्यालय।
यहां एक प्रशिक्षण केंद्र बनाया जा सकता है।
‘पशु मित्र’ को केवल पशुओं की देखभाल तक सीमित न रखकर उसे ग्राम-परामर्शदाता, उद्यमिता सहयोगी और स्थानीय नेतृत्व के वाहक के रूप में विकसित किया जा सकता है।
संगीता जी जैसी बहनों को भी इस अभियान में जोड़ा जाए।
गाजीपुर के हमारे मित्र जुड़ें।
उत्तर प्रदेश के दूसरे जिलों के पशु मित्र जुड़ें।
देश के अलग-अलग हिस्सों में बैठे हमारे प्रवासी भाई-बहन जुड़ें।
फिर देखें—एक छोटा विचार किस तरह एक बड़ा जनआंदोलन बन सकता है।
‘जिला एडॉप्शन’ से जुड़े?
मैं चौधरी जी से कहना चाहता हूं—
एक नई जिम्मेदारी उठाइए।
‘जिला एडॉप्शन प्रोग्राम’ शुरू कीजिए।
लेकिन जिला अपनाने का अर्थ केवल किसी संस्था को अपना नाम देना नहीं होना चाहिए।
जिला अपनाने का अर्थ है—
उस जिले की क्षमता को पहचानना।
हर गांव का सामाजिक और आर्थिक मानचित्र बनाना।
देखना—
कहां जमीन खाली है?
कहां पानी है?
कहां कौन-सी फसल हो सकती है?
कहां कौन-सा छोटा उद्योग लग सकता है?
कौन-सा स्थानीय उत्पाद दूसरे शहरों और देशों तक पहुंच सकता है?
कौन-से युवा कुछ नया करना चाहते हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण—
उस गांव का वह कौन व्यक्ति है, जो बिना किसी पद के भी लोगों को जोड़ सकता है?
उसे खोजिए।
उसे सम्मान दीजिए।
उसे प्रशिक्षित कीजिए।
और फिर उसे जिम्मेदारी दीजिए।
विदेश गया व्यक्ति गांव से क्यों कट जाए?
आज हमारे गांव का एक बेटा लंदन में है।
दूसरा दुबई में।
तीसरा दिल्ली में।
कोई अमेरिका में है।
कोई मुंबई में।
प्रश्न यह नहीं कि वे गांव छोड़कर क्यों गए।
प्रश्न यह है—
क्या वे गांव के लिए वापस कुछ दे सकते हैं?
ज्ञान दे सकते हैं?
तकनीक दे सकते हैं?
बाजार से जोड़ सकते हैं?
अपने अनुभव से गांव के युवाओं को प्रशिक्षित कर सकते हैं?
तो फिर उन्हें गांव से जोड़िए।
रोजगार नहीं, रोजगारदाता तैयार करें
हमारी सोच बदलनी होगी।
हर युवा को नौकरी देने की बात करने से पहले हमें यह पूछना होगा—
कितने युवाओं को हम रोजगार देने वाला बना सकते हैं?
एक गांव में दस छोटे उद्यम खड़े हो जाएं तो दस परिवार बदलेंगे।
दस गांवों में दस-दस उद्यम खड़े हों तो सौ परिवार बदलेंगे।
लेकिन यदि गांव का हर सक्षम व्यक्ति अपने साथ दो और लोगों को जोड़ने लगे, तो परिवर्तन की गति कई गुना बढ़ सकती है।
यही तो अ-सरकारी, असरकारी और स्वाभिमानी सेवा का रास्ता है।
सरकार अपना काम करे।
समाज अपना काम करे।
और दोनों के बीच की दूरी को जिम्मेदार नागरिक नेतृत्व पूरा करे।
अब ‘पशु मित्र’ को ‘ग्राम मित्र’ बनाना है
मेरे लिए यह केवल नाम बदलने का विषय नहीं है।
यह भूमिका बदलने का विषय है।
पशु की सेवा करते-करते गांव को समझना।
गांव को समझते-समझते उसकी अर्थव्यवस्था को समझना।
अर्थव्यवस्था समझते-समझते स्थानीय अवसर खोजना।
और अवसर खोजते-खोजते युवाओं को जोड़ना।
यही क्रम आगे चलकर ग्राम नेतृत्व पैदा कर सकता है।
इसलिए मेरा आग्रह है—
पशु मित्र को नई दृष्टि दें।
गांव को नई दिशा दें।
युवाओं को नया अवसर दें।
और अच्छे लोगों को नेतृत्व दें।
पहला कदम कौन उठाएगा?
मैं यह पत्र किसी सरकार को लिखकर समाप्त नहीं करना चाहता।
मैं यह पत्र आपको लिख रहा हूं।
चौधरी जी—आप आगे आइए।
संगीता जी—आप जुड़िए।
गाजीपुर के मित्र—आप अपनी टीम बनाइए।
उत्तर प्रदेश के पशु मित्र—अपने-अपने जिले की सूची बनाइए।
और जो लोग देश-विदेश में हैं—अपने गांव का नाम लिखकर बताइए कि आप अपने गांव के लिए क्या दे सकते हैं।
पैसा ही योगदान नहीं है।
समय भी पूंजी है।
ज्ञान भी पूंजी है।
अनुभव भी पूंजी है।
संबंध भी पूंजी हैं।
और सबसे बड़ी पूंजी—विश्वास है।
आइए, एक संकल्प लें—
हर जिले में अच्छे लोगों को खोजेंगे।
हर गांव में संभावनाएं खोजेंगे।
हर युवा में क्षमता खोजेंगे।
हर खाली जगह में अवसर खोजेंगे।
और हर प्रवासी को उसकी मिट्टी से फिर जोड़ेंगे।
क्योंकि राष्ट्र केवल संसदों में नहीं बनता।
राष्ट्र गांवों में बनता है।
और गांव केवल योजनाओं से नहीं बदलते।
गांव तब बदलते हैं, जब वहां के अच्छे लोग खड़े होते हैं।
लंदन की इस दूरी से मुझे आज अपने गांव और भी करीब दिखाई दे रहे हैं।
शायद इसलिए कि दूरी ने एक बात स्पष्ट कर दी है—
भारत को बाहर से बदलने की जरूरत नहीं है।
भारत को भीतर से जगाने की जरूरत है।
और यह जागरण किसी एक व्यक्ति का काम नहीं।
आइए, हम सब मिलकर इसकी शुरुआत करें।
आपका,
भाई कमलानंद