आज का पंचांग :जब प्रभु प्रसन्न हों, तो माँगना भी सीखिए काकभुशुण्डि जी से!

पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.

कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्थी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, आश्विन |आज है संकष्टी गणेश चतुर्थी.

आज चतुर्थी तिथि 10:10 PM तक उपरांत पंचमी | नक्षत्र रोहिणी 11:11 AM तक उपरांत म्रृगशीर्षा | परिघ योग 12:05 AM तक, उसके बाद शिव योग | करण बव 11:37 AM तक, बाद बालव 10:10 PM तक, बाद कौलव | आज राहु काल का समय 01:34 PM – 02:58 PM है | आज 10:06 PM तक चन्द्रमा वृषभ उपरांत मिथुन राशि पर संचार करेगा.

जब प्रभु प्रसन्न हों, तो माँगना भी सीखिए काकभुशुण्डि जी से!

कल्पना कीजिए उस अलौकिक क्षण की, जब स्वयं प्रभु श्रीराम काकभुशुण्डि जी के सामने खड़े हैं। प्रभु कहते हैं—माँगो, क्या चाहिए तुम्हें?

यह अवसर था कुछ भी माँग लेने का। संसार का वैभव, अपार ऐश्वर्य, सिद्धियाँ, शक्तियाँ और यहाँ तक कि मुक्ति भी माँगी जा सकती थी। लेकिन काकभुशुण्डि जी ने जो माँगा, वह उनकी भक्ति की गहराई और उनकी बुद्धिमत्ता का परिचायक है।

उन्होंने प्रभु से स्वयं को समर्पित करने वाली वह अनन्य भक्ति माँगी, जो बड़े-बड़े साधु-संतों के लिए भी दुर्लभ है।

तब प्रभु श्रीराम उनकी चतुराई और भक्ति पर मुग्ध होकर कह उठे—

“रीझेउँ देखि तोरी चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई॥”

अर्थात् हे काकभुशुण्डि! तुम्हारी चतुराई देखकर मैं रीझ गया। तुमने मुझसे मेरी भक्ति ही माँग ली, जो मुझे अत्यंत प्रिय है।

जरा अपने जीवन में झाँककर देखिए। जब हमें कुछ माँगने का अवसर मिलता है, तो हमारी सूची में सबसे पहले क्या आता है? धन, पद, प्रतिष्ठा, सफलता, संतान का सुख, रोगों से मुक्ति और संकटों से छुटकारा!

हम प्रभु से संसार की वस्तुएँ माँगते हैं, जबकि काकभुशुण्डि जी ने संसार के स्वामी को ही माँग लिया। हम सुख के साधन चाहते हैं, उन्होंने सुख के स्रोत से ही अपना संबंध माँग लिया।

यही भक्ति और भोग के बीच का अंतर है।

संसार की वस्तुएँ मिलकर भी मनुष्य को पूर्ण संतोष नहीं दे पातीं। एक इच्छा पूरी होती है, तो दूसरी जन्म ले लेती है। लेकिन हृदय में सच्ची भक्ति जाग जाए, तो परिस्थितियाँ बदलें या न बदलें, जीवन को देखने की दृष्टि अवश्य बदल जाती है।

भक्ति का अर्थ केवल पूजा-पाठ, माला फेरना या मंदिर जाना नहीं है। भक्ति का अर्थ है—अपने अहंकार को छोटा करना, अपने कर्मों को पवित्र बनाना, दूसरों के दुःख को समझना और हर परिस्थिति में प्रभु के प्रति विश्वास बनाए रखना।

काकभुशुण्डि जी हमें सिखाते हैं कि प्रभु के सामने खड़े होने पर केवल यह नहीं सोचना चाहिए कि उनसे क्या प्राप्त किया जाए, बल्कि यह भी विचार करना चाहिए कि ऐसा क्या माँगा जाए, जिससे हमारा पूरा जीवन ही सार्थक हो जाए।

इसलिए अगली बार जब हाथ प्रार्थना के लिए जुड़ें, तो केवल यह मत कहिए कि हे प्रभु! मेरी कठिनाइयाँ दूर कर दीजिए। यह भी कहिए—

हे प्रभु! मुझे ऐसी भक्ति दीजिए कि सुख में मैं आपको भूलूँ नहीं, दुःख में आप पर मेरा विश्वास डगमगाए नहीं, सफलता में मेरा अहंकार बढ़े नहीं और सामर्थ्य मिलने पर मेरे हाथ सेवा से रुकें नहीं।

क्योंकि सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि प्रभु हमारी हर इच्छा पूरी कर दें, बल्कि यह है कि हमारा हृदय उनकी इच्छा के प्रति समर्पित होना सीख जाए।

माँगना है, तो प्रभु से प्रभु की भक्ति माँगिए। बाकी सब कुछ क्षणभंगुर है, लेकिन सच्ची भक्ति जीवन को भीतर से समृद्ध कर देती है।

— लेखक की कलम से