पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
श्रावण शुक्ल पक्ष अष्टमी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, श्रावण. आज है दुर्गाष्टमी व्रत.
आज अष्टमी तिथि 09:18 PM तक उपरांत नवमी. नक्षत्र विशाखा 09:08 AM तक उपरांत अनुराधा. इन्द्र योग 04:24 AM तक, उसके बाद वैधृति योग. करण विष्टि 08:16 AM तक, बाद बव 09:18 PM तक, बाद बालव. आज राहु काल का समय 02:05 PM – 03:41 PM है. आज चन्द्रमा वृश्चिक राशि पर संचार करेगा.
जीवन की आंधियों में पुरुषार्थ, प्रार्थना और प्रतीक्षा
जीवन एक समान गति से नहीं चलता। कभी परिस्थितियां हमारे अनुकूल होती हैं तो कभी अचानक ऐसी आंधियां उठती हैं, जो हमारे धैर्य, विश्वास और सामर्थ्य—तीनों की परीक्षा लेने लगती हैं। इन आंधियों का स्वरूप भी अलग-अलग होता है। कुछ आंधियां आती हैं, कुछ देर ठहरती हैं और फिर चली जाती हैं; जबकि कुछ ऐसी होती हैं, जो जाते-जाते हमारे जीवन से बहुत कुछ छीन लेती हैं—चैन, अमन, शांति, स्वास्थ्य और कभी-कभी हमारा आत्मविश्वास भी।
इसीलिए जीवन की आंधियों को समझना और उनका सामना करना सीखना आवश्यक है। आंधी को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके बीच स्वयं को संभालना हमारे हाथ में अवश्य है।
ऐसे कठिन समय में जीवन को संभालने के लिए तीन सूत्र अत्यंत महत्वपूर्ण हैं—पुरुषार्थ, प्रार्थना और प्रतीक्षा।
पहला सूत्र है—पुरुषार्थ।
पुरुषार्थ केवल मेहनत करने का नाम नहीं है। पुरुषार्थ वह कर्म है, जिसे हम पूरे उत्साह, आनंद और ईमानदारी के साथ करते हैं। हमारे कर्म में सत्य हो, नैतिकता हो और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव हो। परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, मनुष्य को अपने कर्म से विमुख नहीं होना चाहिए। कर्म ही वह शक्ति है, जो अंधकार के बीच रास्ता बनाती है।
दूसरा सूत्र है—प्रार्थना।
प्रार्थना को केवल मांगने तक सीमित कर देना उसके व्यापक अर्थ को छोटा कर देना है। सच्ची प्रार्थना तो कृतज्ञता है—उस परम सत्ता के प्रति आभार, जिसने हमें मनुष्य के रूप में जन्म दिया, विवेक दिया और संघर्ष करने की क्षमता दी। प्रार्थना मनुष्य के भीतर विनम्रता और विश्वास पैदा करती है। यह हमें याद दिलाती है कि हमारी शक्ति सीमित हो सकती है, लेकिन हमारी आस्था की कोई सीमा नहीं।
तीसरा सूत्र है—प्रतीक्षा।
प्रतीक्षा निष्क्रिय बैठने का नाम नहीं है। इसका अर्थ है—अपना कर्म पूरी निष्ठा से करने के बाद परिणाम के लिए धैर्य रखना। हमने अपनी ओर से प्रयास किया है, अब परिणाम कब और किस रूप में मिलेगा, इसका निर्णय उस परम शक्ति पर छोड़ देना ही सच्चा विश्वास है।
मनुष्य का जीवन इसी संतुलन से सार्थक बनता है—कर्म में पुरुषार्थ, हृदय में प्रार्थना और परिणाम के लिए प्रतीक्षा।
जब यह विश्वास भीतर गहराई से स्थापित हो जाता है कि हमारी मेहनत व्यर्थ नहीं जाएगी और ईश्वर हमारे सच्चे प्रयासों को उचित दिशा देगा, तब बड़ी से बड़ी विपरीत परिस्थिति भी हमें भीतर से नहीं तोड़ पाती।
जीवन की आंधियां आएंगी। कभी वे केवल दस्तक देकर लौट जाएंगी और कभी अपने साथ बहुत कुछ बहा ले जाने का प्रयास करेंगी। लेकिन यदि हमारे भीतर पुरुषार्थ की शक्ति, प्रार्थना की विनम्रता और प्रतीक्षा का धैर्य है, तो कोई भी आंधी हमारे जीवन की जड़ों को उखाड़ नहीं सकती।
आंधियां हमारे रास्ते की परीक्षा हो सकती हैं, हमारी मंजिल का अंत नहीं।
अंततः यही जीवन का संदेश है—मेहनत हमें करनी है, विश्वास हमें रखना है और परिणाम उस परम सत्ता पर छोड़ देना है। तब जीवन में आने वाली हर बड़ी आंधी अंततः ‘आई-गई’ आंधी बन जाएगी, ‘आई-ले गई’ आंधी नहीं।





