पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
आश्विन शुक्ल पक्ष तृतीया, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, आश्विन.
आज तृतीया तिथि 11:28 PM तक उपरांत चतुर्थी | नक्षत्र विशाखा 01:42 AM तक उपरांत अनुराधा | प्रीति योग 08:23 PM तक, उसके बाद आयुष्मान योग | करण तैतिल 10:46 AM तक, बाद गर 11:28 PM तक, बाद वणिज | आज राहु काल का समय 03:06 PM – 04:32 PM है | आज 07:12 PM तक चन्द्रमा तुला उपरांत वृश्चिक राशि पर संचार करेगा.
आज का विचार
सबंध को ज्ञान एवं पैसे से भी बड़ा बताया गया है, क्योकि, जब ज्ञान और पैसा विफल हो जाता है, तब सबंध से स्थिति सम्भाली जा सकती है, मधुर सबंध बनाकर जीवन सार्थक कीजिये
आज का भगवद चिन्तन
तृतीय नवरात्रि की मंगल बधाई
अपने शरणागत की दुर्गति का नाश कर उसको सदगति प्रदान करने वाली शक्ति का नाम ही दुर्गा है इसीलिए ‘दुर्गा दुर्गति नाशिनी’ भी कहा गया है। दुर्गा शक्ति की उत्पत्ति के पीछे भी बहुत से कारण हैं तथापि मुख्यतः जगत जननी माँ जगदम्बा द्वारा दुर्गम नामक असुर का नाश करने के कारण ही उनका नाम ‘दुर्गा’ पड़ा।
दुर्गम अर्थात जिस तक पहुंचना आसान काम नहीं अथवा जिसका नाश करना हमारी सामर्थ्य से बाहर हो। मनुष्य के भीतर छुपे यह काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे दुर्गुण ही तो दुर्गम असुर हैं जिनका नाश करना आसान तो नहीं लेकिन माँ की कृपा से असंभव भी नहीं है।
नारी के भीतर छुपे स्वाभिमान व सामर्थ्य का प्राकट्य ही ‘दुर्गा’ है। परम शक्ति सम्पन व परम वन्दनीय होने पर भी जब-जब समाज में नारी के प्रति एक तिरस्कृत भाव रखा जाएगा, तब- तब नारी द्वारा अपने शक्ति प्रदर्शन का नाम ही ‘दुर्गा’ है। नवरात्रि का तृतीय दिवस माँ चन्द्रघंटा को समर्पित है।
यह शक्ति माता का शिवदूती स्वरूप है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्द्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। माता चंद्रघंटा शक्ति माता का शिवदूती स्वरूप है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्द्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है।
भारत भूमि के धरातल पर युगों से परम शक्ति ईश्वर के दर्शन की लालसा चली आ रही है। यहां समृद्ध परम्पराएं इस बात की गवाह हैं, कि यहाँ मानवता व धर्म की रक्षा हेतु ईश्वरीय शक्ति का किसी न किसी रूप में अवतार होता रहता है। हो भी क्यों न? क्योंकि धरती में सुख समृद्धि बिना देव-देवी कृपा के नहीं हो सकती है।
मानव जीवन भटकर अंधकार में गुम सा हो जाएगा। कुटिल, दुष्ट, भयंकर राक्षसी प्रवृत्ति संसार में व्याप्त होकर धर्म व मानवता को हानि पहुंचाने हेतु सदैव तत्पर होने लगती है। दैत्यों के संहार व अनीत व अनाचार को हटाने के लिए ही माँ दुर्गा नव रूपों में प्रकट हुई है।
जिसमें माँ दुर्गा के तृतीय मूर्ति को चंद्रघण्टा के नाम से जाना जाता है। मां श्रद्धालु भक्तों की भय पीड़ा व दु:खों को मिटाने वाली है। भक्त जनों के मनोरथ को पूर्ण करने वाली है।
देवी के इस रूप की उत्पत्ति नवरात्रि के तीसरे दिन होती हैं। यह रूप सभी प्रकार की अनूठी वस्तुओं को देने वाला तथा कई प्रकार की विचित्र दिव्य ध्वनियों को प्रसारित व नियंत्रित करने वाला होता है। इनकी कृपा से व्यक्ति की घ्राण शक्ति और दिव्य होती है। वह कई तरह की खुशबुओं का एक साथ आनन्द लेने में सक्ष्म हो जाता है।
माँ दैत्यों का वध करके देव, दनुज, मनुजों के हितों की रक्षा करने वाली है। जिनके घण्टा में आह्ल्लादकारी चंद्रमा स्थिति हो उन्हें चन्द्रघण्टा कहा जाता है। अर्थात् जिनके माथे पर अद्र्धचंद्र शोभित हो रहा है।
जिनकी कांति सुवर्ण रंग की है ऐसी नव दुर्गा के इस तृतीय प्रतिमा को चन्द्रघण्टा के नाम से ख्याति प्राप्त हुई हैं। यह दैत्यों का संहार भयानक घण्टे की नाद से करती है। यह माता दस भुजा धारी है। जिनके दाहिने हाथ में ऊपर से पद्म, वाण, धनुष, माला आदि शोभित हो रहे है। जिनके बायं हाथ में त्रिशूल, गदा, तलवार, कमण्डल तथा युद्ध की मुद्रा शोभित हो रही है। माता सिंह में सवार होकर जगत के कल्याण हेतु दुष्ट दैत्यों को मारती हैं। माँ का यह रूप शत्रुओं को मारने हेतु सदैव तत्पर रहता है।
माता चंद्रघण्टा की पूजन विधि
माँ चंद्रघण्टा श्री माँ दुर्गा का तृतीय रूप है, जिनकी पूजा आराधना नवरात्रि के तीसरे दिन करने का विधान होता होता है। अत: माँ चन्द्रघण्टा की पूजा शास्त्रीय विधान को अपनाते हुए करना चाहिए। शारीरिक शुद्धता के साथ ही मन की पवित्रता का भी ध्यान रखना चाहिए।
इस दिन माता की पूजा विविध प्रकार के सुगन्धित पुष्पों तथा विविध प्रकार के नैवेद्यों व इत्रों से करने का विधान होता है। जिससे साधक को वांछित फलों की प्राप्ति होती है। शरीर में उत्पन्न पीड़ाओं का अंत होता है। पूजा व क्षमा प्रार्थना के बाद माँ को प्रणाम करते हुए पूजा व आराधना को माता को अर्पण कर देना चाहिए।
माता चंद्रघण्टा की कथा
माँ चन्द्रघण्टा असुरों के विनाश हेतु माँ दुर्गा के तृतीय रूप में अवतरित होती है। जो भयंकर दैत्य सेनाओं का संहार करके देवताओं को उनका भाग दिलाती है। भक्तों को वांछित फल दिलाने वाली हैं। आप सम्पूर्ण जगत की पीड़ा का नाश करने वाली है। जिससे समस्त शात्रों का ज्ञान होता है, वह मेधा शक्ति आप ही हैं।
दुर्गा भव सागर से उतारने वाली भी आप ही है। आपका मुख मंद मुस्कान से सुशोभित, निर्मल, पूर्ण चन्द्रमा के बिम्ब का अनुकरण करने वाला और उत्तम सुवर्ण की मनोहर कान्ति से कमनीय है, तो भी उसे देखकर महिषासुर को क्रोध हुआ और सहसा उसने उस पर प्रहार कर दिया, यह बड़े आश्चर्य की बात है।
जब देवी का वही मुख क्रोध से युक्त होने पर उदयकाल के चन्द्रमा की भांति लाल और तनी हुई भौहों के कारण विकराल हो उठा, तब उसे देखकर जो महिषासुर के प्राण तुरंत निकल गये, यह उससे भी बढ़कर आश्चर्य की बात है, क्योंकि क्रोध में भरे हुए यमराज को देखकर भला कौन जीवित रह सकता है। देवि! आप प्रसन्न हों।
परमात्मस्वरूपा आपके प्रसन्न होने पर जगत् का अभ्युदय होता है और क्रोध में भर जाने पर आप तत्काल ही कितने कुलों का सर्वनाश कर डालती हैं, यह बात अभी अनुभव में आई है क्योंकि महिषासुर की यह विशाल सेना क्षण भर में आपके कोप से नष्ट हो गयी है।
कहते है कि देवी चन्द्रघण्टा ने राक्षस समूहों का संहार करने के लिए जैसे ही धनुष की टंकार को धरा व गगन में गुजा दिया वैसे ही माँ के वाहन सिंह ने भी दहाडऩा आरम्भ कर दिया और माता फिर घण्टे के शब्द से उस ध्वनि को और बढ़ा दिया, जिससे धनुष की टंकार, सिंह की दहाड़ और घण्टे की ध्वनि से सम्पूर्ण दिशाएं गूँज उठी। उस भयंकर शब्द व अपने प्रताप से वह दैत्य समूहों का संहार कर विजय हुई।
इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए तैयार रहने जैसी है। इनके घंटे की भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव, दैत्य आदि सभी डरते हैं। महत्व असुरों के साथ युद्ध में देवी चंद्रघंटा ने घंटे की टंकार से असुरों का नाश कर दिया था।
नवरात्रि के तृतीय दिन इनका पूजन किया जाता है। इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वत: प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।
मां चंद्रघंटा को यह लगाएं भोग
माता चंद्रघंटा को भोग के रूप में दूध से बनी चीजें चढ़ाई जाएं तो श्रेष्ठ है। माना जाता है माता को दूध और मेवे की खीर प्रिय है। यह भी मान्यता है कि इस दिन कन्याओं को दूध और चावल की खीर खिलाने और दान-पुण्य करने से माता अति प्रसन्न होती हैं और साधक के सभी दुखों का नाश करती हैं। भोग के रूप में यदि मां चंद्रघंटा को मखाने की खीर का भोग लगाया जाए तो अति उत्तम है।