पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, यही मंगलकामना है। ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
भाद्रपद शुक्ल पक्ष अष्टमी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, भाद्रपद. आज है दुर्गाष्टमी व्रत और राधाष्टमी.
आज अष्टमी तिथि 03:27 PM तक उपरांत नवमी. नक्षत्र मूल 01:42 AM तक उपरांत पूर्वाषाढ़ा. आयुष्मान योग 02:28 PM तक, उसके बाद सौभाग्य योग. करण बव 03:27 PM तक, बाद बालव 04:40 AM तक, बाद कौलव. आज राहु काल का समय 09:19 AM – 10:50 AM है. आज चन्द्रमा धनु राशि पर संचार करेगा.
युवा : संस्कार, साहस और संकल्प के प्रतीक
अनादिकाल से संसार युवाओं में अपने भविष्य की छवि देखता आया है। युवा केवल किसी राष्ट्र की जनसंख्या का एक हिस्सा नहीं, बल्कि उसके स्वप्नों, संकल्पों और संभावनाओं का जीवंत प्रतिबिंब होते हैं। संसारभर के युवा अपनी ऊर्जा, जिज्ञासा और कुछ नया कर गुजरने की आकांक्षा में एक जैसे दिखाई दे सकते हैं, लेकिन भारत की युवा-अवस्था अपने भीतर एक विशिष्ट सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संभावना समेटे हुए है। क्योंकि भारत में शिक्षा के साथ संस्कार का आग्रह आज भी उसकी रज-रज और कण-कण में विद्यमान है।
शिक्षा मनुष्य को ज्ञान देती है, पर संस्कार उस ज्ञान को दिशा प्रदान करते हैं। शिक्षा बुद्धि को विकसित करती है, जबकि संस्कार विवेक को जागृत करते हैं। इसलिए भारत की युवा शक्ति का वास्तविक निर्माण केवल विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में नहीं, बल्कि परिवार, समाज, संस्कृति और जीवन-मूल्यों की उस परंपरा में होता है, जो मनुष्य को अपने से ऊपर उठकर राष्ट्र और मानवता के लिए जीना सिखाती है।
स्वामी विवेकानंद जी ने युवाओं में मानवता के भविष्य की अपार संभावनाएँ देखी थीं। उनका विश्वास था कि जागृत, चरित्रवान और संकल्पशील युवा ही समाज में परिवर्तन का आधार बन सकते हैं। आज जब दुनिया अनेक चुनौतियों से जूझ रही है, तब युवा शक्ति को केवल रोजगार और प्रतिस्पर्धा तक सीमित न रखकर उसे चरित्र, कर्तव्य, करुणा और नेतृत्व से जोड़ना आवश्यक है।
भारतीय महाकाव्यों में युवाओं के लिए प्रेरणा के अनेक आदर्श मिलते हैं। रामायण के अंगद और महाभारत के अभिमन्यु ऐसे ही दो सशक्त प्रतीक हैं। अंगद का रावण की सभा में निर्भीक होकर अपना पैर जमाना केवल शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि सत्य, आत्मविश्वास और धर्म के पक्ष में अडिग खड़े होने का प्रतीक था। उनके पैर की वह धमक आज भी युवाओं को यह संदेश देती है कि अन्याय और अहंकार के सामने भयभीत होकर झुकना नहीं, बल्कि सत्य के साथ दृढ़ता से खड़ा होना ही वास्तविक साहस है।
दूसरी ओर, अभिमन्यु का चरित्र अदम्य वीरता, कर्तव्यनिष्ठा और संघर्षशीलता का प्रतीक है। चक्रव्यूह में प्रवेश करने का उनका साहस और युद्धभूमि में उनका समर्पण युवाओं को सिखाता है कि कठिन परिस्थितियाँ भी संकल्पवान मनुष्य के उत्साह को समाप्त नहीं कर सकतीं। उनके जीवन की त्रासदी हमें यह विचार करने के लिए भी प्रेरित करती है कि साहस के साथ पूर्ण ज्ञान, मार्गदर्शन और सामूहिक सहयोग कितना आवश्यक है।
युवा संसद का उद्देश्य केवल भाषण देना या विचारों का आदान-प्रदान करना नहीं होना चाहिए, बल्कि युवाओं के भीतर निर्भीकता, संस्कार, विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्माण करना होना चाहिए। हमारे युवा अंगद की तरह अन्याय के सामने अडिग रहें, अभिमन्यु की तरह साहसी और कर्तव्यनिष्ठ बनें, साथ ही ज्ञान, धैर्य और दूरदृष्टि को अपना जीवन-आधार बनाएँ।
क्योंकि राष्ट्र का भविष्य केवल युवाओं की संख्या से नहीं, बल्कि उनके चरित्र की ऊँचाई, विचारों की पवित्रता और कर्मों की सार्थकता से निर्मित होता है। जिस युवा के भीतर संस्कार का प्रकाश और संकल्प की अग्नि प्रज्वलित हो जाती है, वह स्वयं भी आगे बढ़ता है