सेवा और समर्पण की मिसाल हैं मनमोहन सिंह बिष्ट, रिटायर होने पर भी जारी है प्रकृति की सेवा

देहरादून : कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता एक पत्थर तो तबियत … इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है कि सेवानिवृत्त वन अधिकारी मनमोहन सिंह बिष्ट ने. बिष्ट उन चुनिंदा अधिकारियों में रहे, जिन्होंने अपनी ड्यूटी को केवल नौकरी नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम समझकर निभाया। उन्होंने वह कर दिखाया, जो अक्सर केवल आदेशों के दायरे में सीमित रहने वाला अधिकारी नहीं कर पाता। बिना किसी सरकारी या बाहरी वित्तीय सहायता के, क्षेत्र के लोगों को साथ लेकर उन्होंने जंगल और जल संरक्षण के क्षेत्र में ऐतिहासिक कार्य किए।

मनमोहन सिंह बिष्ट ने विगत 19 वर्षों से पर्यावरण संरक्षण संवर्धन के लिए शासकीय एवं अर्द्धशासकीय शिक्षण संस्थाओं के छात्र-छात्राओं, सरकारी कर्मचारी, ग्रामवासियों एवं गैरसरकारी संस्थाओं के सहयोग से जन-जागरूकता कार्यक्रम चला कर स्थानीय समुदाय को पर्यावरण संरक्षण प्रयासों में भाग लेने हेतु प्रेरित किया, जिससे जन-सामान्य में हमारी पर्यावरण संरक्षण के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी की भावना बढ़ सके। बिना किसी संस्था के वित्तीय सहयोग से जल स्रोतों का उपचार, वनों का संरक्षण एवं संवर्धन कार्य सर्व सम्मति बना कर विभिन्न क्षेत्रों में कई रचनात्मक एवं अभिनव कार्य से आदर्श कार्य मॉडल के रूप में विकसित किया गया। कार्य विवरण निम्न प्रकार से है:-

प्रकृति/पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में किये गये कार्य-

ग्राम अलमस के समीप लगभग 365 हैक्टेयर व अलमस 10 हैक्टेयर, सुवाखोली-साटागाड 17 कि०मी० पथ वृक्षारोपण, भजनगढ़ 2 हैक्टेयर, आराखाल 5 हैक्टेयर, ढाणा 2 हैक्टेयर आदि क्षेत्रों में प्रकृति संरक्षण व संवर्धन कार्य समाज के विभिन्न वर्गों, संस्थाओं एवं छात्र-छात्राओं के सहयोग से कार्य किये गये।

बुरांश वृक्ष उत्तराखण्ड का राज्य वृक्ष व संकटापन्न एक प्रजाति है। बुरांश वृक्ष संरक्षण संवर्धन के लिए अभिनव प्रयास के रूप में पौधशालाओं में बुरांश दस हजार से अधिक पौध तैयार कर बुरांस खण्ड नामक स्थान पर 5000 बुरांश पौध का रोपण कर प्रदेश का प्रथम बुरांश वृक्षारोपण क्षेत्र विकसित किया गया।

मुनि-की-रेती से चम्बा तक 65 कि०मी० राष्ट्रीय राजमार्ग के दोनो ओर राजमार्ग निर्माण के मलबे से दब जाने के कारण बहुमूल्य प्राकृतिक वृक्ष, पौध, झाड़ी प्रजातियों नष्ट हो रही थी। वृक्ष प्रजातियों के संरक्षण के लिए रचनात्मक कार्य प्रयास के रूप विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से कई चरणों में 45 दिनों तक निरन्तर सामूहिक प्रयास से गेठी, केसिया, सामिया, बकैन, सादण, केसिया ग्लूका, जामुन आदि के बड़ी संख्या में बहुमूल्य प्रजातियों का संरक्षण व संवर्धन का कार्य सामूहिक मिलजुल कर सफलता पूर्वक किया गया। क्षेत्र में विभिन्न संरक्षण गतिविधियों को अपनाने से स्थानीय पारिस्थिति की को पुर्नजीवित करने में सहायता मिली है।

उत्तराखण्ड में चीड पिरूल वनाग्नि का मुख्य स्रोत से पर्यावरण को प्रतिवर्ष हो रही क्षति के निराकरण के लिए चीड़ पिरूल से जैविक चैकडाम, जैविक खाद, पाईनपिट एवं मशरूम के उत्पादन साधन के रूप में चीड़ पिरूल को स्थानीय ग्रामवासियों के लिए रोजगार एवं आय अर्जन का साधन बनाने का अभिनव प्रयास किया गया। चीड पिरूल से पिरुल नैट वायर केट चैकडाम, व जैविक खाद बनाने से क्षेत्र के वनो की आग से सुरक्षा, भूमि एवं नमी संरक्षण के साथ साथ पर्यावरण संरक्षण में उपयोगी सिद्ध हुए है। इस अभिनय कार्य मॉडल को उत्तराखण्ड वनविभाग द्वारा कैटप्लान हेवर रिवर रिज्यूवेशन जैसे कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्टों में सफलता पूर्वक लागू किया गया।

पर्यावरण सरंक्षण एवं पारिस्थितिकी सरंक्षण के लिए रोजगारपरक कार्यक्रम

टिहरी गढ़वाल क्षेत्र के मगरा में क्षेत्र में 62 वृक्ष, मौरयाणा में 250 वृक्ष, व फेकवापानी (रानीचौरी) में 65 वृक्षों का उच्चगुणवत्ता अखरोट मदर ब्लॉक व प्रेमनगर देहरादून में सेन्टर ऑफ एक्सलेस की स्थापना कर प्रदेश में, अखरोट ग्राम तैयार करने के उददेश्य से तकनीकी जानकारी, प्रचार-प्रसार एवं उन्नत किस्म की पौध उपलब्ध कराने के साथ-साथ प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाकर स्थानीय ग्रामवासियों को उनकी आय वृद्धि एवं आय का अतिरिक्त साधन उपलब्ध कराने के साथ-साथ परिस्थिति की संरक्षण के उददेश्य से सफल प्रयास किये गये है। वर्ष 2024-2025 में इसी प्रयास में ग्राम पापड़ा में 30 वृक्ष, ग्राम कटर खेत में 100 वृक्ष (टिहरी जनपद) धौनिक, क्वील, मदोली, कोटी, ग्राम क्लसर व चकराता (देहरादून) में 200 वृक्षों का (Village Collester) अखरोट ग्राम तैयार कराने में तकनीकी जानकारी सलाहकार सेवा प्रदान कर तैयार किये गये है।

टिहरी गढ़वाल के मगरा में उच्चगुणवता अखरोट (चाडलर) मदर ब्लॉक के 62 वृक्ष, मौर्याणा में 250 बुक्षों व फेकेवापानी में 76 वृक्षों का व प्रेमनगर देहरादून में सेन्टर ऑफ एक्सलेन्स व अखरोट (चाडलर) की 1100 वृक्ष/पोध को तैयार करके ग्राम वासियों को रोजगार एवं आयअर्जन का अतिरिक्त साधन उपलब्ध कराने व विभिन्न गाँवों को Walnut willage बनाने अखरोट व पारिस्थिति की सरक्षण व संतुलन बनाये रखने का सफल प्रयास किए गए।

पर्यावरण संरक्षण एवं पर्यायवरण शिक्षा के लिए विभिन्न कार्यक्रम

स्थानीय ग्रामवासियों विभिन्न स्थानीय संस्थाओं/संस्थानों के छात्र-छात्राओं, गैरसरकारी संस्थाओं एवं विभागीय कर्मचारियों के सहयोग से वनों की सुरक्षा, पर्यावरण शिक्षा/पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिए विभिन्न स्थानों पर 28 संख्या सीडबॉल कार्यक्रम, 7 सं० बर्डवाचिंग कार्यक्रम 21 सं० नुक्कड़ नाटक, 111 सं० अपनी प्रकृति को जाने (KNOW YOUR NATURE) कार्यक्रम एवं 167 संख्या पर्यावरण शिक्षा/पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रम अलमस, थत्यूड़, थान, भवान, बुरांशखण्डा, रोतू की वेली, धनोल्टी, मुनिकीरीति ऋषिकेश (टि०ग०) होरावाला, राजकीय महिला वीएड कालेज, सब्बावाला, (देहरादून) आदि क्षेत्रों में जागरूकता उत्पन्न करने, व प्रकृति को समीप से जानने व इसकी उपयोगिता को समझाने के लिए प्रेरित करने के प्रयास किये गये।

पर्यावरण संरक्षण संबंधी गतिविधियों से ग्राम अलमस, रोतू की वेली, फेड़ी किमोड़ा मगरा आदि के समीप के अवनत वन क्षेत्र पूरी तरह से वृक्ष वनस्पति से आच्छादित होकर अपने पुराने स्वरूप में एक आदर्श वन क्षेत्र के स्वरूप में आ गया है। क्षेत्र में बॉज, बुरांश, काफल, अयार के वृक्ष च तिमूर, बेडू किंगोड, सतावरी हिसर आदि की औषधीय झाड़ियों व स्थानिक घास प्रजातियों के पुर्नजनन की स्थिति में सुधार हुआ है। क्षेत्र का हरित आवरण बढ़ा है तथा सघनता बढ़ी है। क्षेत्र में विभिन्न संरक्षण गतिविधियों से आये सुधार से पक्षी जीवन व अन्य वन्य जीव-जन्तुओं की स्थिति में पहले की अपेक्षा अधिक सुधार देखने को मिला व वन्यजीवों के वाश स्थल में सुधार हुआ है।

प्राकृतिक जल स्रोत उपचार, जल संरक्षण उपचार कार्यों से जल स्रोतों से पानी की मात्रा में पहले की अपेक्षा अधिक वृद्धि हुई है। वन्यजीवों, पालतू पशुओं को ग्रीष्मकाल में अधिक समय तक पीने का पानी उपलब्ध हो रहा है।

थत्यूड़, रोतू-की-वेली. अलमस, बुरांशखण्डा, धनोल्टी, मुनिकीरेती, ताछला, फकोट, सावली आदि। स्वच्छता जागरूकता कार्यक्रम/रैली आयोजन से स्थानीय निवासियों ने स्वच्छता बनाये रखने के लिये कूड़ादान रखने लगे हैं व दूसरों को भी इस कार्य के लिए प्रेरित करते हैं।

पर्यावरण संरक्षण गतिविधियों का प्रभाव रहा है कि अब स्थानीय ग्रामवासी अवैध लौपिंग व पातन नहीं करते हैं तथा वनाग्नि की घटना पर तत्काल वनाग्नि पर नियंत्रण करने व रोकथाम करने का प्रयास करते हैं।

पर्यावरण/प्रकृति संरक्षण संबंधी प्रेरक कार्यक्रम व प्रयासों का सामूहिक प्रभाव न केवल पर्यावरण को सुधारने में सहायक रहा बल्कि संरक्षण प्रथाओं के प्रति जागरूकता और भागीदारी की भावना विकसित हुई है।

प्रकृति संरक्षण गतिविधियों एवं प्रयासों से क्षेत्र में समाज के सभी वर्गो की सामाजिक कार्यों में भागीदारी व सहयोग बढ़ा है। अब सभी लोग पर्यावरण संरक्षण गतिविधियों में भाग लेने के लिए दूसरों को भी प्रेरित करते हैं।

पर्यावरण संरक्षण गतिविधियों का प्रभाव रहा है ग्राम अलमस, रोतू-की वेली, फेडी किमोड़ाकि ग्रामवासियों द्वारा जल एवं वनों की सुरक्षा के लिए अपनी समिति बनाई गयी है, जिनकी कार्य जिम्मेदारी भी वे निश्चित करते हैं। गांव क्षेत्र में किसी भी प्रकार के अवैद्य पातन, लॉपिंग वनाग्नि की घटना की सूचना मिलने पर तुरन्त रोकथाम व समन का प्रयास करते हैं।

पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता जन जागरूकता कार्यक्रमों का इतना प्रभाव पड़ा है कि अब लोग अपना निजि कूड़ादान रखने लगे हैं तथा दूसरों को भी कूड़ा इधर-उधर वन क्षेत्रों में न फेकने के लिए प्रेरित करते हैं।

प्राकृतिक जल स्रोत उपचार गतिविधियों से ढाणा, मगरा, रोतू की वेली, अलमस, ज्वारना, लब्बाखाला, गंजरवाला, स्यूड गाड आदि जल स्रोत्रों में पानी की मात्रा में वृद्धि हुई है एवं पानी का प्रवाह अधिक समय तक बना रहता है, जिससे ग्रामवासियों व उनके पालतू पशुओं, वन्यजीवों व पक्षियों को आसानी से पीने का पानी उपलब्ध हुआ है। पर्यावरणीय गतिविधियों, जन जागरूकता कार्यक्रमों का क्षेत्र के ग्रामवासियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है अब वे पर्यावरण के महत्व, आवश्यकता को समझने लगे हैं, तथा उन में सहयोग, एकता सहभागीता की भावना जागृत हुई है. अब सभी लोग सामाजिक कार्यों को सहभागिता से मिल-जुलकर करने लगे हैं।

क्षेत्र में विगत कई वर्षों से किये गये संरक्षणकार्यों को परिणाम स्वरूप अब आसपास के वन क्षेत्र अपने पुराने स्वरूप में आ गये हैं। क्षेत्र एक सघन- आर्दशवन क्षेत्र का रूप ले चुका है, जो आस पास के सभी लोगों को आकर्षित एवं प्रेरित करता है।

गांव के आस पास कई सघन चारा गाह विकास क्षेत्र विकसित हुए हैं, जिसके कारण अब ग्रामवासियों को अपने पालतूपशुओं के लिए प्रर्याप्त मात्रा में चारा घास व ईंधन उपलब्ध हो रहा है, इसके लिए ग्रामवासियों को गांव से दूर दूसरे क्षेत्रों में नहीं जाना पड़ता है।

क्षेत्र में सामूहिक सहभागिता से किये गये पर्यावरणीय सुधार कार्य प्रयास का परिणाम, व्यापक व सकारात्मक रहा है, जिसको देखने के लिए प्रदेश एवं दूसरे प्रदेशो के विभिन्न वानिकी, प्रशिक्षण संस्थान, उच्च शिक्षण संस्थाओं के छात्र-छात्राएँ, शोधकर्ताओं द्वारा समय समय पर “अध्ययन भ्रमण” के लिए क्षेत्र में आते रहते हैं व ग्रामवासियों से व्यक्तिगत संवाद बनाते हैं। कार्य एवं तकनीक प्रयासों को जानने का प्रयास करते हैं।

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