पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
आज आपका दिन मंगलमयी हो, ‘हिमशिखर खबर’ हर रोज की तरह आज भी आपके लिए पंचांग प्रस्तुत कर रहा है.
श्रावण शुक्ल पक्ष चतुर्थी, रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083, शक संवत पराभव 1948, श्रावण. आज है वरद चतुर्थी.
आज चतुर्थी तिथि 04:52 PM तक उपरांत पंचमी. नक्षत्र हस्त 03:50 AM तक उपरांत चित्रा. साध्य योग 04:07 AM तक, उसके बाद शुभ योग. करण विष्टि 04:53 PM तक, बाद बव 04:51 AM तक, बाद बालव. आज राहु काल का समय 05:19 PM – 06:54 PM है | आज चन्द्रमा कन्या राशि पर संचार करेगा.
प्रभु की शरण में रहें
पांडवो के जीवन में अनगिनत दुःख आये लेकिन उन्होंने इन दुखो को अपना प्रारब्ध मान कर सहा।
उन्होंने कभी इन बातो की शिकायत श्रीकृष्ण से नहीं की जो उनके परम् स्नेही थे निकट के संबंधी थे और उस पर पांडव ये भी जानते थे की कृष्ण परम् भगवान है।
पांडवो को कृष्ण के प्रति अगाध श्रद्धा थी।उन्होंने हर स्थिति में कृष्ण पर अपना विश्वास रखा और उनकी शरण में हमेशा अपने आपको सुखी समझा चाहे स्थितियां कितनी भी विपरीत रही हो।
जब युद्ध समाप्त हुआ और पांडवो को उनका राज्य मिल गया तब कृष्ण वापिस द्वारिका जाने लगे तो पांडवो की माता कुंती महारानी ने उनसे प्रार्थना की जो बड़ी अद्भुत है और एक शुद्ध भक्त ही ये प्रार्थना कर सकता है।
उन्होंने भगवान से कहा की हे गोविन्द हमारी जिंदगी में हमेशा दुःख ही दुःख आये ताकि आप हमेशा हमारे साथ रहो।
आपने हमारे दुःख के समय में एक पल भी हमें नहीं छोड़ा और आज जब सुख आया है तो आप हमें छोड़ कर जा रहे हो।
ऐसा सुख किस काम का जिसमे आप हमारे साथ नहीं रहो इससे तो दुःख ही अच्छा था जो आप हमारे साथ हर कदम पर थे।
कथा का तात्पर्य यही है की दुःखों से कभी घबराना नहीं चाहिए। जैसे एक काबिल व्यक्ति को ही मुश्किल कार्य दिए जाते है उसी तरह जो भगवान के प्रिय होते है उन्ही की परीक्षा भगवान लेते है।
दुःख में हम समझते है की हमारा कोई नहीं है पर ये हमारी अज्ञानता है।
भगवान हर पल हमारे साथ होते है पर अज्ञानता के कारण हम उन्हें महसूस नहीं कर पाते।
जहा प्रभु है वहा अन्धकार नहीं है आइये इस भौतिक जगत की माया के अन्धकार को पीछे छोड़ते हुए प्रभु की शरण की और चले जहा केवल परम् आनंद है।
आज का भगवद् चिन्तन
शिवाश्रय महिमा
भगवान शिव स्वयं तो पूज्य हैं ही लेकिन उन्होंने प्रत्येक उस प्राणी को भी पूज्य बना दिया जो उनकी शरण में आ गया। शिव आश्रय ले लेने पर वक्र चन्द्र अर्थात वो चन्द्रमा जिसमें अनेक विकृतियां,अनेक दोष हैं पर वो भी वन्दनीय बन गए।जिसे मनुष्यों का जन्मजात शत्रु माना जाता है,वही सर्प जब भगवान शिव की शरण लेकर उनके गले का हार बन जाता है तो फिर पूज्यनीय भी बन जाता है।
यह भगवान महादेव के संग का ही प्रभाव है कि शिवजी के साथ-साथ नाग देव के रूप में सर्प को भी सारा जगत पूजता है।भगवान महादेव अपने आश्रित को केवल पुजारी बनाकर ही नहीं रखते अपितु पूज्य भी बना देते हैं। हमें भी यथा संभव दूसरों का सम्मान एवं सहयोग करना चाहिए।जीवन इस प्रकार का हो कि आपसे मिलने के बाद सामने वाले का हृदय उत्साह, प्रसन्नता और आनंद से परिपूर्ण हो जाये।





