पंचांग का अति प्राचीन काल से ही बहुत महत्त्व माना गया है. ज्योतिष शास्त्रों में भी पंचांग को बहुत महत्त्व दिया गया है और पंचांग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना गया है.
पंडित उदय शंकर भट्ट
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श्रावण कृष्ण पक्ष की पावन एकादशी आज है. श्रीहरि को तुलसी चढ़ाने से मिलता है विशेष पुण्य, पुराणों में वर्णित है व्रत का माहात्म्य
युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा था कामिका एकादशी का रहस्य.
ब्रह्माजी ने नारद को सुनाई थी इसकी महिमा. पश्चात्ताप, संयम और भगवान विष्णु की शरणागति का संदेश देती है कथा
सनातन परंपरा में एकादशी केवल उपवास की तिथि नहीं, बल्कि आत्मसंयम, साधना और भगवान के प्रति समर्पण का पर्व मानी जाती है। श्रावण कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी इसी आध्यात्मिक परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी है। पौराणिक ग्रंथों में इसे भगवान श्रीहरि विष्णु को प्रिय और पापों के क्षय की कामना से किया जाने वाला व्रत बताया गया है।
कामिका एकादशी की कथा में एक ऐसे क्षत्रिय का प्रसंग आता है, जिसके हाथों क्रोधवश एक ब्राह्मण की मृत्यु हो जाती है। अपराधबोध से टूटे उस व्यक्ति को जब अपने कर्म का पश्चात्ताप होता है तो वह प्रायश्चित्त की राह तलाशता है। उसे कामिका एकादशी का व्रत, श्रीहरि का पूजन और तुलसीदल अर्पित करने का मार्ग बताया जाता है। कथा का संदेश है कि सच्चा पश्चात्ताप, संयम और ईश्वर की शरण मनुष्य के अंत:करण को बदलने की शक्ति रखते हैं।
युधिष्ठिर ने पूछा—हे माधव! बताइए कामिका एकादशी का माहात्म्य
पौराणिक आख्यान के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा—
“हे जनार्दन! श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है? उसका क्या माहात्म्य है और उसका व्रत करने से मनुष्य को क्या फल प्राप्त होता है?”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—
“हे राजन! श्रावण कृष्ण पक्ष की एकादशी कामिका एकादशी कहलाती है। यह भगवान श्रीहरि को प्रिय है। इसके व्रत और विष्णु पूजन से मनुष्य को पापों से निवृत्ति और भगवान की कृपा प्राप्त होती है।”
श्रीकृष्ण ने आगे बताया कि इस एकादशी का माहात्म्य पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने देवर्षि नारद को सुनाया था।
नारद ने पूछा—कौन-सा व्रत मनुष्य को पापों से बचा सकता है?
एक बार देवर्षि नारद ने ब्रह्माजी से लोककल्याण की भावना से पूछा—
“हे पितामह! श्रावण कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम क्या है? इसका व्रत किस प्रकार करना चाहिए और इससे मनुष्य को क्या फल प्राप्त होता है?”
ब्रह्माजी बोले—
“हे नारद! यह एकादशी कामिका नाम से प्रसिद्ध है। जो मनुष्य श्रद्धा से इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करता है, वह श्रीहरि की कृपा का पात्र बनता है।”
ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु को तुलसी की प्रियता का भी वर्णन किया। इसलिए इस दिन भगवान श्रीहरि को तुलसीदल अर्पित करने की परंपरा विशेष महत्व रखती है।
क्रोध में हुई ब्राह्मण की मृत्यु, फिर जागा अंतरात्मा का पश्चात्ताप
बहुत समय पहले एक शक्तिशाली क्षत्रिय था। वह वीर था, लेकिन स्वभाव से क्रोधी था।
एक दिन किसी बात को लेकर उसका एक ब्राह्मण से विवाद हो गया। विवाद बढ़ता गया और क्षत्रिय ने क्रोध में आकर ऐसा कर्म कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप ब्राह्मण की मृत्यु हो गई।
क्षणभर बाद उसका क्रोध शांत हुआ तो उसे अपने किए का अहसास हुआ।
उसका मन ग्लानि से भर उठा—
“मैंने घोर अपराध कर दिया। अब इस पाप से मेरा उद्धार कैसे होगा?”
वह प्रायश्चित्त का मार्ग पूछने के लिए विद्वान ब्राह्मणों के पास गया।
ब्राह्मणों ने बताया—कामिका एकादशी का व्रत करो
विद्वानों ने उससे कहा—
“तुमसे अत्यंत गंभीर अपराध हुआ है। भगवान की शरण लो। श्रावण कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत करो। भगवान विष्णु का पूजन करो, तुलसीदल अर्पित करो, भगवान के नाम का स्मरण करो और रात्रि में जागरण कर श्रीहरि की भक्ति में समय बिताओ।”
क्षत्रिय ने इसे अपने जीवन का प्रायश्चित्त मानकर व्रत का संकल्प लिया।
एकादशी के दिन उसने स्नान किया। भगवान विष्णु की पूजा की। दीप प्रज्वलित किया और श्रद्धापूर्वक तुलसीदल अर्पित किया।
दिनभर वह श्रीहरि का स्मरण करता रहा।
रात्रि में उसने जागरण किया और भगवान विष्णु के नाम, स्तुति तथा भजन में अपना समय व्यतीत किया।
उसकी आंखों में पश्चात्ताप था और हृदय में केवल एक ही पुकार—
“हे श्रीहरि! मैं अपराधी हूं। आपकी शरण में आया हूं। मुझे धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति दें।”
पश्चात्ताप और भक्ति से बदला जीवन
पौराणिक कथा के अनुसार उसकी श्रद्धा, पश्चात्ताप और भगवान विष्णु की भक्ति से श्रीहरि प्रसन्न हुए और उसे पापबंधन से मुक्ति प्राप्त हुई।
कथा का मूल संदेश यही है कि ईश्वर की भक्ति केवल बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि अंत:करण के परिवर्तन का माध्यम है।
कामिका एकादशी मनुष्य को यह स्मरण कराती है कि क्रोध में किया गया एक क्षण का कर्म जीवनभर का पश्चात्ताप बन सकता है। इसलिए आत्मसंयम, क्षमा और विवेक ही धर्म का आधार हैं।
एकादशी का असली अर्थ—सिर्फ अन्न का त्याग नहीं
धार्मिक दृष्टि से एकादशी का व्रत केवल भोजन से विरत रहने तक सीमित नहीं माना जाता। इसका व्यापक आध्यात्मिक भाव मन, वाणी और कर्म पर संयम है।
कामिका एकादशी पर भक्त भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए अपने भीतर के क्रोध, लोभ, अहंकार और द्वेष को त्यागने का संकल्प लेते हैं।
यही इस कथा का सबसे बड़ा संदेश है—
“उपवास शरीर का हो सकता है, लेकिन वास्तविक व्रत मन के विकारों का त्याग है।”
कामिका एकादशी पर क्या करें?
- प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें।
- भगवान विष्णु या श्रीहरि का पूजन करें।
- भगवान को श्रद्धापूर्वक तुलसीदल अर्पित करें।
- दीपदान और विष्णु मंत्र का जाप करें।
- दिनभर भगवान का स्मरण, भजन और सत्संग करें।
- सामर्थ्य हो तो रात्रि जागरण करें।
- द्वादशी में विधिपूर्वक पारण करें।
- जरूरतमंदों को दान और सेवा करें।
- पौराणिक संदेश
“जहां पश्चात्ताप सच्चा हो, वहां सुधार का मार्ग खुलता है”
कामिका एकादशी की कथा मनुष्य को भय नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का मार्ग दिखाती है। यह बताती है कि जीवन में गलती हो जाए तो उसे छिपाने के बजाय स्वीकार करना चाहिए, प्रायश्चित्त करना चाहिए और अपने आचरण को बदलना चाहिए।
भगवान श्रीहरि की शरण में समर्पण का अर्थ केवल पापों से मुक्ति की कामना नहीं, बल्कि धर्म, सत्य और सदाचार के मार्ग पर लौटने का संकल्प भी है।
श्रीहरि को प्रिय तुलसी
भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का विशेष महत्व माना गया है। कामिका एकादशी के दिन भगवान को तुलसीदल अर्पित करने की परंपरा इसी वैष्णव भक्ति का प्रतीक है।
भक्त के लिए तुलसी का एक पत्ता केवल पत्ता नहीं, बल्कि श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है।
फलश्रुति : भक्ति से निर्मल हो अंत:करण
कामिका एकादशी श्रद्धा, संयम और श्रीहरि की भक्ति का पर्व है। पौराणिक मान्यता है कि विधिपूर्वक व्रत और भगवान विष्णु की आराधना करने से पापों का क्षय होता है और भक्त को भगवान की कृपा प्राप्त होती है।
लेकिन इस कथा का सबसे गहरा संदेश है—
“भगवान की शरण वही सार्थक है, जो मनुष्य को भीतर से बदल दे।”
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।